
Source: ਸਿੱਖ ਦੀ ਪੂਜਾ, ਨਾਮ ਦਾ ਪੁਜਾਰੀ
मैं इक विदवान नूं कहिंदे सुणिआ के सिख लई पूजा मना है। मैं पुछिआ किउं तां आखदे गुरमति अनुसार मूरती अगे घंटी वजाउणा मनां है, फुलां दे हार पाउणा मनां है। मैं फेर पुछिआ की तुसीं इहनां करमां नूं पूजा मंनदे हों, तां आखदे दुनीआं इहनां नूं पूजा आख रही है ते गुरमति इसनूं मनां करदी है। मैं कई वार पुछिआ के फेर तुसीं इहनां करमां नूं पूजा मंनदे हों जां नहीं? पूजा दा स़बदी अरथ की है। उहनां ताने मिहणे मार के विचार तों भजणा ठीक समझिआ पर विचार नहीं कीती। हुण स़बदी रूप विच पूजा करन दा भाव हुंदा है स़रधा भावना प्रकट करना। पूजा दा स़ाबदिक अरथ सतिकार, सेवा ते आदर नाल किसे नूं याद करना हुंदा है। गुरबाणी ने गुणां दी विचार, नाम (सोझी) प्रापत करन नूं सची पूजा दसिआ है। गुरमति ने पूजा भाव सतिकार दे भाव नाल सेवा करना रद किते नहीं कीता, बस इह कहिआ है के सिख लई सची पूजा गिआन/सोझी लैणा है। संसार संसे (स़ंके) विच किसे वी करम नूं पूजा कही जावे की फरक पैंदा है। सिख नूं तां गुरमति विच दसी पूजा करनी है। आओ वेखदे हां गुरबाणी विच किहड़ी पूजा करन दा सिख नूं आदेस़ है
जिन कउ सतिगुरि थापिआ तिन मेटि न सकै कोइ॥ ओना अंदरि नामु निधानु है नामो परगटु होइ॥ नाउ पूजीऐ नाउ मंनीऐ अखंडु सदा सचु सोइ॥ – भाव नाम (गुणां दी सोझी) नूं पूजणा है, नाम नूं मंनणा है।
संचि हरि धनु पूजि सतिगुरु छोडि सगल विकार॥ जिनि तूं साजि सवारिआ हरि सिमरि होइ उधारु॥१॥
गुरु परमेसुरु पूजीऐ मनि तनि लाइ पिआरु॥सतिगुरु दाता जीअ का सभसै देइ अधारु॥ सतिगुर बचन कमावणे सचा एहु वीचारु॥ बिनु साधू संगति रतिआ माइआ मोहु सभु छारु॥
ओसु अंतरि नामु निधानु है नामो परवरिआ॥ नाउ पूजीऐ नाउ मंनीऐ नाइ किलविख सभ हिरिआ॥ जिनी नामु धिआइआ इक मनि इक चिति से असथिरु जगि रहिआ॥
आतमा देउ पूजीऐ गुर कै सहजि सुभाइ॥ आतमे नो आतमे दी प्रतीति होइ ता घर ही परचा पाइ॥ आतमा अडोलु न डोलई गुर कै भाइ सुभाइ॥ गुर विणु सहजु न आवई लोभु मैलु न विचहु जाइ॥
हरि अमिउ रसाइणु पीवीऐ॥ मुहि डिठै जन कै जीवीऐ॥ कारज सभि सवारि लै नित पूजहु गुर के पाव जीउ॥
साधसंगि जपिओ भगवंतु॥ केवल नामु दीओ गुरि मंतु॥ तजि अभिमान भए निरवैर॥ आठ पहर पूजहु गुर पैर॥
काटि जेवरी कीओ दासरो संतन टहलाइओ॥ एक नाम को थीओ पूजारी मो कउ अचरजु गुरहि दिखाइओ॥ – जिहड़ा एके दे गिआन दा पुजारी सी, एके दी पूजा करदा सी केवल उसनूं ही प्रापती होई।
अतखदे प्रभ दा सिमरन ही पूजा है "प्रभ कै सिमरनि रिधि सिधि नउ निधि॥ प्रभ कै सिमरनि गिआनु धिआनु ततु बुधि॥ प्रभ कै सिमरनि जप तप पूजा॥
हरि का नामु जन कउ भोग जोग॥ हरि नामु जपत कछु नाहि बिओगु॥ जनु राता हरि नाम की सेवा॥ नानक पूजै हरि हरि देवा॥
उतम भगती दी मति भा्व भगउती बारे आखदे हन "भगउती भगवंत भगति का रंगु॥ सगल तिआगै दुसट का संगु॥ मन ते बिनसै सगला भरमु॥ करि पूजै सगल पारब्रहमु॥ साधसंगि पापा मलु खोवै॥ तिसु भगउती की मति ऊतम होवै॥
ठाकुर दा सेवक तां सदा ही पुजारी है, नाम दा पुजारी, गिआन दा सोझी दा गुणां दा पुजारी "ठाकुर का सेवकु आगिआकारी॥ ठाकुर का सेवकु सदा पूजारी॥
सिख ने सच दी पूजा करनी है "तू सचा साहिबु आपि है सचु साह हमारे॥ सचु पूजी नामु द्रिड़ाइ प्रभ वणजारे थारे॥ – सच दी पूजा है गुणां दी विचार। इस लई कोई टल वजाउण दी लोड़ नहीं पैंदी, कोई फुल फल भेंट नहीं करमे पैंदे। मन, हउमै, विकार भेंट करने पैंदे हन।
नाम दी पूजा उह आप ही कराउंदा है "हरि नामु द्रिड़ावहि हरि नामु सुणावहि हरि नामे जगु निसतारिआ॥ गुर वेखण कउ सभु कोई लोचै नव खंड जगति नमसकारिआ॥ तुधु आपे आपु रखिआ सतिगुर विचि गुरु आपे तुधु सवारिआ॥ तू आपे पूजहि पूज करावहि सतिगुर कउ सिरजणहारिआ॥
जिन॑ नानकु सतिगुरु पूजिआ तिन हरि पूज करावा॥
भगत कबीर जी आखदे हन "पूजहु रामु एकु ही देवा॥ साचा नावणु गुर की सेवा॥
पूजा कीचै नामु धिआईऐ बिनु नावै पूज न होइ॥
जो सचे दे गुणां दी, नाम दी पूजा करदा है उस बारे आखदे हन "सतिगुरु भेटे ता पारसु होवै पारसु होइ त पूज कराए॥ जो उसु पूजे सो फलु पाए दीखिआ देवै साचु बुझाए
जीअ की बिरथा होइ सु गुर पहि अरदासि करि॥ छोडि सिआणप सगल मनु तनु अरपि धरि॥ पूजहु गुर के पैर दुरमति जाइ जरि॥ साध जना कै संगि भवजलु बिखमु तरि॥
पिछदे किहड़ी पूजा करां, फेर जवाब दिंदे हन "धूप दीप नईबेदहि बासा॥ कैसे पूज करहि तेरी दासा॥३॥ तनु मनु अरपउ पूज चरावउ॥ गुर परसादि निरंजनु पावउ॥ – तन मन दोवें अरपण करदे सौप दे गुर (गुणां) नूं, इही पूजा है।
ते नेत्र भले परवाणु हहि मेरी जिंदुड़ीए जो साधू सतिगुरु देखहि राम॥ ते हसत पुनीत पवित्र हहि मेरी जिंदुड़ीए जो हरि जसु हरि हरि लेखहि राम॥ तिसु जन के पग नित पूजीअहि मेरी जिंदुड़ीए जो मारगि धरम चलेसहि राम॥ नानकु तिन विटहु वारिआ मेरी जिंदुड़ीए हरि सुणि हरि नामु मनेसहि राम॥
जनु कहै नानकु मिलि साधसंगति हरि हरि नामु पूजेहा ॥
सो सतिगुरु पूजहु दिनसु राति जिनि जगंनाथु जगदीसु जपाइआ ॥
गुरसिखां मनि हरि प्रीति है गुरु पूजण आवहि ॥
हरि नामु हम स्रेवह हरि नामु हम पूजह हरि नामे ही मनु राता ॥ – आखदे हरि नाम दी पूजा असीं करदे हां, हरि नाम (सोझी) दे विछ ही मन रचिआ रहिंदा है। गुर की सेवा स़बद वीचार दसी है। जिस नूं इह समझ लग जांदी है उस नूं होर किसे पूजा दे करमां दी लोड़ नहीं रहिंदी।
करि पूजा होमि इहु मनूआ अकाल मूरति गुरदेवा ॥३॥
दुबिधा न पड़उ हरि बिनु होरु न पूजउ मड़ै मसाणि न जाई ॥
हरि नाल प्रीत ही जप है, तप है पूजा है – "सो जपु सो तपु सा ब्रत पूजा जितु हरि सिउ प्रीति लगाइ॥बिनु हरि प्रीति होर प्रीति सभ झूठी इक खिन महि बिसरि सभ जाइ॥ – हरि कौण, जप अते तप बारे असीं पहिलां हौ विचार चुके हां।
दह दिसि पूज होवै हरि जन की जो हरि हरि नामु धिआए ॥ – दस दिस़ावां दी पूजा हरि जन लई हो जादी है जदों हरि दे जम हरि दे गुणां नूं धिआन विच रखदे हन।
गुरु सतिगुरु पारब्रहमु करि पूजहु नित सेवहु दिनसु सभ रैनी ॥
उह आप ही पुजारी है ते आप ही पूजा वी है – " अनिक रंग निरगुन इक रंगा॥ आपे जलु आप ही तरंगा॥२॥ आप ही मंदरु आपहि सेवा॥ आप ही पूजारी आप ही देवा॥३॥, "एकस बिनु नाही को दूजा॥ तुम॑ ही जानहु अपनी पूजा॥२॥
मंने नामु सची पति पूजा॥ किसु वेखा नाही को दूजा॥ देखि कहउ भावै मनि सोइ॥ नानकु कहै अवरु नही कोइ॥
मै अवरु गिआनु न धिआनु पूजा हरि नामु अंतरि वसि रहे॥ भेखु भवनी हठु न जाना नानका सचु गहि रहे॥
गुरु मेरी पूजा गुरु गोबिंदु॥ गुरु मेरा पारब्रहमु गुरु भगवंतु॥ गुरु मेरा देउ अलख अभेउ॥ सरब पूज चरन गुर सेउ॥
गुर (गुण) ही मेरे लई देवता है देओ है ते गुर (गुण) ही पूजा – "गुरु मेरी पूजा गुरु गोबिंदु॥ गुरु मेरा पारब्रहमु गुरु भगवंतु॥ गुरु मेरा देउ अलख अभेउ॥ सरब पूज चरन गुर सेउ॥
ना किछु भरमु न दुबिधा दूजा॥ एको एकु निरंजन पूजा॥ जत कत देखउ आपि दइआल॥ कहु नानक प्रभ मिले रसाल॥
हुण इह दसो के मैं किवें आख देवां के गुरबाणी विच पूजा वरजित है। गुरबाणी आखदी है के जो जिसदी जितनी सोझी है उह कर रहिआ है। गुरबाणी तां आख रही है के "कोई नावै तीरथि कोई हज जाइ॥ कोई करै पूजा कोई सिरु निवाइ॥२॥ कोई पड़ै बेद कोई कतेब॥ कोई ओढै नील कोई सुपेद॥३॥ कोई कहै तुरकु कोई कहै हिंदू॥ कोई बाछै भिसतु कोई सुरगिंदू॥४॥ कहु नानक जिनि हुकमु पछाता॥ प्रभ साहिब का तिनि भेदु जाता॥ – फेर जे सब कुझ हुकम विच हो रहिआ है, सानूं तां हुकम बूझणा सी। असीं किथे गुरमति विच दसी पूजा नूं छड के दूजिआं दे मगर ही लठ लै के भजण लग परे के इह तुहाडी पूजा तां गुरमति रद कर रही है। भाई दूजे नूं छडो, तुसीं तां उह पूजा करो जो तुहानूं गुरबाणी करन नूं आख रही है।
हरि की पूजा दुलंभ है संतहु कहणा कछू न जाई॥१॥संतहु गुरमुखि पूरा पाई॥ नामो पूज कराई॥१॥
हरि साचे भावै सा पूजा होवै भाणा मनि वसाई ॥
सबदि मरै मनु निरमलु संतहु एह पूजा थाइ पाई॥५॥ – स़बद दुआरा, नाम, सोझी, गुणां से गिआन, हुकम बूझ के मन दा मरना ही असली पूजा है सिख लई।
बिनु नावै होर पूज न होवी भरमि भुली लोकाई ॥
गुरमुखि होवै सु पूजा जाणै भाणा मनि वसाई॥
पेखन कउ नेत्र सुनन कउ करना॥ हसत कमावन बासन रसना॥ चरन चलन कउ सिरु कीनो मेरा॥ मन तिसु ठाकुर के पूजहु पैरा॥
ब्रहमणु ब्रहम गिआन इसनानी हरि गुण पूजे पाती॥ एको नामु एकु नाराइणु त्रिभवण एका जोती॥
सतिगुरु है गिआनु सतिगुरु है पूजा॥ सतिगुरु सेवी अवरु न दूजा॥ सतिगुर ते नामु रतन धनु पाइआ सतिगुर की सेवा भाई हे॥
कीमति कोइ न जाणै दूजा॥ आपे आपि निरंजन पूजा॥ आपि सु गिआनी आपि धिआनी आपि सतवंता अति गाड़ा॥
पुंन दान पूजा परमेसुर जुगि जुगि एको जाता ॥
सतिगुरू के चरन धोइ धोइ पूजहु इन बिधि मेरा हरि प्रभु लहु रे ॥
पूजा जाप ताप इसनान॥ सिमरत नाम भए निहकाम॥
जा की द्रिसटि दुख डेरा ढहै॥ अंम्रित नामु सीतलु मनि गहै॥ अनिक भगत जा के चरन पूजारी॥ सगल मनोरथ पूरनहारी॥
पारब्रहम के भगत निरवैर॥ सो निसतरै जो पूजै पैर॥आदि पुरखि निंदकु भोलाइआ॥ नानक किरतु न जाइ मिटाइआ॥
नामु हमारै बेद अरु नाद॥ नामु हमारै पूरे काज॥ नामु हमारै पूजा देव॥ नामु हमारै गुर की सेव॥
अंतरि पूजा मन ते होइ॥ एको वेखै अउरु न कोइ॥ दूजै लोकी बहुतु दुखु पाइआ॥ सतिगुरि मैनो एकु दिखाइआ॥
हरि के संत सदा थिरु पूजहु जो हरि नामु जपात॥ जिन कउ क्रिपा करत है गोबिदु ते सतसंगि मिलात॥
जो गुर कउ जनु पूजे सेवे सो जनु मेरे हरि प्रभ भावै ॥
जो गुर कउ जनु पूजे सेवे सो जनु मेरे हरि प्रभ भावै॥ हरि की सेवा सतिगुरु पूजहु करि किरपा आपि तरावै॥
प्रभ पूजहो नामु अराधि॥ गुर सतिगुर चरनी लागि॥ हरि पावहु मनु अगाधि॥ जगु जीतो हो हो गुर किरपाधि॥
ब्रहम कमल पुतु मीन बिआसा तपु तापन पूज करावैगो॥ जो जो भगतु होइ सो पूजहु भरमन भरमु चुकावैगो॥
हरि हरि रूपु हरि रूपो होवै हरि जन कउ पूज करावैगो ॥
आतम देउ देउ है आतमु रसि लागै पूज करीजै ॥
नाइ तेरै तरणा नाइ पति पूज ॥
गुण गावै नित नित नित नवे॥ लख चउरासीह जोनि न भवे॥ ईहां ऊहां चरण पूजारे॥ मुखु ऊजलु साचे दरबारे॥
जह जह देखा तह तह सोई॥ बिनु सतिगुर भेटे मुकति न होई॥ हिरदै सचु एह करणी सारु॥ होरु सभु पाखंडु पूज खुआरु॥६॥दुबिधा चूकै तां सबदु पछाणु॥ घरि बाहरि एको करि जाणु॥ एहा मति सबदु है सारु॥ विचि दुबिधा माथै पवै छारु॥
लेहु आरती हो पुरख निरंजन सतिगुर पूजहु भाई॥ ठाढा ब्रहमा निगम बीचारै अलखु न लखिआ जाई॥
गुरमुखि परतीति भई मनु मानिआ अनदिनु सेवा करत समाइ॥ अंतरि सतिगुरु गुरू सभ पूजे सतिगुर का दरसु देखै सभ आइ॥ मंनीऐ सतिगुर परम बीचारी जितु मिलिऐ तिसना भुख सभ जाइ॥ हउ सदा सदा बलिहारी गुर अपुने जो प्रभु सचा देइ मिलाइ॥ नानक करमु पाइआ तिन सचा जो गुर चरणी लगे आइ॥
सो भाई जिहड़ी पूजा करन नूं गुरमति मैनूं आख रही है मैं उह पंकतीआं लभ के इस लेख विच इकतर कीतीआं हन। जिहड़ी पूजा किसे नूं रद कीती जाप रही है, मैं उहनां पंकतीआं वल धिआन ही नहीं दिंदा। आदेस़ मेरे लई है के मैं की करना। दूजे नूं टोकणा रोकणा मेरा कंम नहीं है। जिस नूं जो हुकम होइआ उह कर रहिआ है। इक वार मैनूं समझ आ जावे मैं उही करना। हुकम, नाम (सोझी), गुणां दा गिआन ते विचार मेरे लई पूजा है। गुर की सेवा स़बद विचार है, मैं तां हुण इस वल ही धिआन रखणा है। जिहड़े मूरख दिख रहे हन, पाखंड करदे दिख रहे हन उह वी उसदे हुकम विच ही लगे हन
ना को मूरखु ना को सिआणा॥ वरतै सभ किछु तेरा भाणा॥
अपनै रंगि करता केल॥ आपि बिछोरै आपे मेल॥ इकि भरमे इकि भगती लाए॥ अपणा कीआ आपि जणाए॥
जदों हुकम होइआ उहनां नूं परमेसर ने आप ही जगा के सहीबपूजा वल ला देणा।

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