
Source: ਚਰਿਤ੍ਰੋਪਖ੍ਯਾਨ ਚਰਿਤ੍ਰ ਦੋਇ ਸੌ ਇਕਹਤਰਿ (੨੭੧) – Charitropakhyan charitra 271
चरित्र दोइ सौ इकहतरि – छल, काम ते अंधἑभरोसे दा चरित्र (गुरू गोबिंद सिंघ जी॥ चरित्रोपख्यान ॥ स्री दसम ग्रंथ साहिब जी महाराज)
अफजूं॥ चौपई॥ तेलंगा जह देस अपारा॥ समर सैन तह को सरदारा॥ ताहि बिलास देइ घर रानी॥ जा की जात न प्रभा बखानी॥१॥ – तेलंगा दे विस़ाल देस़ दा दा राजा समरसैन सी। उसदी सुंदर राणी सी जिस दी खूबसूरती बिआन नहीं कीती जा सकदी सी।
तिह इक छैल पुरी संन्यासी॥ तिह पुर मद्र देस कौ बासी॥ रानी निरखि लगनि तिह लागी॥ जा ते नींद भूख सभ भागी॥२॥ – उस स़हिर विच इक सुंदर ते तिआगवान संनिआसी रहिंदा सी, जिसनूं वेखदे ही राणी उस उपर ऐसी मोहित होई कि उसदी नींद ते भुख दोवें खतम हो गए।
रानी की ताहू सौ लागी॥ छूटै कहा अनोखी जागी॥ इक दिन तिह सौ भोग कमायो॥ भोग किया तिम द्रिड़ त्रिय भायो॥३॥ – राणी उस संनिआसी ते इंनी फ़िदा हो गई कि आपणी अजीब लगन ते दुरमति नहीं छड सकी, अते इक दिन उस नाल मिलाप करके उसदा मोह होर वी गहिरा हो गिआ।
बहु दिन भोग तवन संगि किया॥ ऐसुपदेस तवन कह दिया॥ जौ मै कहौ मित्र सो कीजहु॥ मेरो कहियो मानि करि लीजहु॥४॥ – राणी ने कई दिन उस संनिआसी नाल भोग कीता, अते फिर उसने उसनूं किहा कि मेरी इक गल मितर वांग मंन लै।
कहूं जु म्रितक परियो लखि पैयौ॥ ता को काटि लिंग लै ऐयौ॥ ताहि कुपीन बिखै द्रिड़ रखियहु॥ भेद दूसरे नरहि न भखियहु॥५॥ – राणी ने इक मरे होए मनुख नूं वेख के उसदा लिंग कट के लिआंदा अते संनिआसी नूं किहा कि इसनूं आपणे लंगोट विच छुपा के रख, तां जो किसे होर नूं इह भेद पता ना लगे।
अड़िल॥ जब मै देहो तुमै उराभे लाइ कै॥ तब तुम हम पर उठियहु अधिक रिसाइ कै॥ काढि कुपीन ते हम पर लिंग चलाइयो॥ हो ऊच नीच राजा कह चरित दिखाइयो॥६॥ – जदों मैं तैनूं गले लगावां, तूं गुसे दा नाटक करके मेरे उते चड़्हणा, फिर लंगोट विचों उह लिंग कढ के मेरे उते रख देणा, तां जो राजे नूं मूरख बणा के धोखा दिता जा सके।
चौपई॥ सोई काम मित्र तिह कीना॥ जिह बिधि सौ तवनै सिख दीना॥ रानी प्रात पतिहि दिखराई॥ संन्यासी पहि सखी पठाई॥७॥ – संनिआसी ने राणी दी सिखलाई अनुसार सभ कुझ कीता, राणी ने सवेरे राजे नूं मिली अते संनिआसी नूं मिलण लई आपणी सखी नूं भेज दिता।
संन्यासी जुत सखी गहाई॥ राजा देखत निकट बुलाई॥ छैल गिरहि बहुत भाति दुखायो॥ तै चेरी संग भोग कमायो॥८॥ – संनिआसी ने सखी नूं फड़ के बुलाइआ, राजे ने इह सभ देखिआ, अते संनिआसी ने घर विच उसनूं कई तर्हां तड़पा के अंत विच उस दासी नाल भोग कीता।
यौ सुनि बचन तेज मन तयो॥ कर महि काढि छुरा कह लयो॥ कटियो लिंग बसत्र ते निकारा॥ राज तरुनि के मुख पर मारा॥९॥ – इह सुण के राजे दा तेज भड़किआ, उसने छुरी कढ के संनिआसी दा लिंग कटिआ अते कपड़िआं विचों कढ के राणी दे मूंह ते सुट मारिआ।
हाइ हाइ रानी कहि भागी॥ ता के उठि चरनन संग लागी॥ हमि रिखि तुमरो चरित न जाना॥ बिनु समुझे तुहि झूठ बखाना॥१०॥ – राणी चीखदी होई भजी ते राजे दे पैरां विच डिग के कहिण लगी कि मैं तेरा सुभाउ नहीं जाणिआ अते बिना समझे झूठ बोल के तैनूं धोखा दिता।
तब राजे इह भाति बिचारी॥ इंद्री काटि संन्यासी डारी॥ ध्रिग ध्रिग कुपि रानियहि उचारा॥ तै त्रिय किया दोख यह भारा॥११॥ – राजे ने सोचिआ कि संनिआसी ने बुरा कीता है, इस लई उसदी इंद्री कट के सज़ा दिती अते राणी नूं डांटिआ कि तूं ही इस भारी पाप दी मुख कारन हैं।
अब इह राखु आपने धामा॥ सेवा करहु सकल मिलि बामा॥ जब लगि जियै जान नहि दीजै॥ सदा जती की पूजा कीजै॥१२॥ – राजे ने हुकम दिता कि हुण इस संनिआसी नूं आपणे घर विच रखो, सभ इसदी सेवा करो, हुण इह जती है, इसनूं कदे मारोἑडांटो ना, अते जद तक इह जीवे, इस तिआगी दी सदा पूजाἑसेवा कीती जावे।
रानी बचन न्रिपति को माना॥ बहु बिधि साथ ताहि ग्रिह आना॥ भोग करै बहु हरख बढाई॥ मूरख बात न राजै पाई॥१३॥ – राणी ने राजे दी गल मंन के संनिआसी नूं घर लिआंदा, उसदी हर तर्हां खुस़ी नाल सेवा कीती, पर मूरख राजे नूं इह समझ ना आई कि उह असल विच की कर रही सी। राणी आपणा चरितर खेड गई ते हुण सनिआसी उसदे घर विच ही सी।
दोहरा॥ इह बिधि चरित बनाइ कै ताहि भजा रुचि मान॥ जीवत लगि राखा सदन सका न न्रिपति पछान॥१४॥ – इस तर्हां राणी ने इह सारा चरितर रच के संनिआसी नूं आपणे मनमुताबक भजा लिआ, अते राजा जीवन भर उस धोखे नूं समझ ना सकिआ।
इति स्री चरित्र पख्याने त्रिया चरित्रे मंत्री भूप संबादे दोइ सौ इकहतरि चरित्र समापतम सतु सुभम सतु॥२७१॥५२६७॥ – इस तर्हां स्री चरित्र पख्यान देत्रिया चरित्र पुसतक विच मंतरी ते राजे दी गलबात विच २७१ वां चरित्र खतम होइआ।
इस चरित्र दा नैतिक सार
इह कहाणी दिखाउंदी है कि किवें धोखा, काम ते मूरखता मिल के इक राजे नूं अंन्हा बणा दिंदे हन। राणी ने संनिआसी नाल अनैतिक सबंध बणाके उसदी मदद नाल झूठा नाटक रचिआ अते राजे नूं भरमित कीता। राजा आपणी मूरखता ते अंधἑभरोसे कारन सच नूं समझ ना सकिआ अते सारी उमर धोखे विच रिहा। इह चरित्र सिखाउंदा है कि अंधἑविस़वास, कामना अते अकल दी कमी मनुख नूं सभ तों वडे पतन वल लै जांदे हन। जिहड़ा काम वास़ना विच लिपत है उह सनिआसी नहीं है। लिंग कटे जाण ते कोई मनुख जती नहीं हो जांदा इह समाज विच गलत धारणा है। दसम पातिस़ाह आखदे "प्रीति करे प्रभु पायत है क्रिपाल न भीजत लांड कटाए ॥। मन दी मूल दा खतम होणा जति है। अज वी समाज विच आए दिन ऐसे सनिआसी रूप धारण कीते धोखेबाज मिल जांदे हन। सनिआसी काम विच किवें फस गिआ। जे राणी दे मन विच गलत खिआल आए तां सनिआसी दा फरज बणदा सी उसनूं सही राह दसणी। इहो जिहे चरितर सानूं अज आम ही दिस जांदे हन। दसम बाणी सानूं सुचेत कर रही है ते सोचण नूं प्रेरित करदी है।
चरितर बणदा है गुणां दे नाल। गुण हासल हुंदे हन मनुख दे हालात, उसदी संगत, उसदे निजी तजरबिआं नाल, उसदे गिआन नाल।
गुणां दी मति है गुरमति। गुणां दे गिआन नाल चरितर सवारिआ जांदा है। जिवें गुरबाणी आखदी है के "बिनु देखे उपजै नही आसा ॥ जदों अगिआनता हो जावे आस जाग जावे उसनूं काबू करन दा मारग है गिआन। चरितर दुआरा पातिस़ाह ने सपस़ट कीता है, समझाइआ है के वेखो भाई इह सब तुहाडे नाल वी हो सकदा है। धिआन रहे। बच के रहो।
आपणा चरितर देखण लई कोई स़ीस़ा नहीं हुंदा। तुसीं की करदे हों किवें सोचदे हों जदों कोई देख नहीं रहिआ हुंदा उस नाल तुहाडा चरितर पता लगदा है। तुहाडे अंदर की है, तुसीं गल कितनी सपस़ट करदेवहों, झूठ तां नहीं बोलदे, प्रधानगी दी, मस़हूर होण दी कितनी लालसा है इस नाल वी तुहाडा चरितर पता लगदा है। इमानदारी, निरपखदा, किरदार ते चरितर दी नींह हुंदी है। आचरण केवल बाहरी दिखावा हुंदा है सोझी तुहाडी काइआ दा प्रतिबिंब।

Source: ਚਰਿਤ੍ਰੋਪਖ੍ਯਾਨ ਚਰਿਤ੍ਰ ਦੋਇ ਸੌ ਇਕਹਤਰਿ (੨੭੧) – Charitropakhyan charitra 271