Source: ਚਰਿਤ੍ਰੋਪਖ੍ਯਾਨ ਚਰਿਤ੍ਰ ਇਕ ਸੌ ਸਠ (੧੬੦) – Charitropakhyan charitra 160

चरित्रोपख्यान चरित्र इक सौ सठ (१६०) ἓ Charitropakhyan charitra 160

चरित्र इक सौ सठवो – छल, काम ते मोह दी कथा (गुरू गोबिंद सिंघ जी॥ चरित्रोपख्यान ॥ स्री दसम ग्रंथ साहिब जी महाराज)

अफजूं॥ चौपई॥ बलवंड सिंघ तिरहुति को न्रिप बर॥ जनु बिधि करियो दूसरो तम हर॥ अमित रूप ता को अति सोहै॥ खग म्रिग जछ भुजंगन मोहै॥१॥ – बलवंड सिंघ तिरहुत दा इक राजा सी, जिसनूं प्रभू ने असुरां दा नास करन लई रचिआ, उह अति सुंदर सी, इस कदर कि पंछी, जानवर, यकस़ ते सप वी उसदे रूप तों मोहित हो जांदे सन।

रानी साठि सदन तिह माही॥ रूपवती तिन सम कहूं नाही॥ सभहिन सौ पति नेह बढावत॥ बारी बारी केल कमावत॥२॥ – राजे दे महल विच सठ राणीआं सन, सभ तों सुंदर उही सी, अते राजा हर इक नाल वारी वारी प्रेम ते मिलाप करदा सी॥

रुकम कला रानी रस भरी॥ जोबन जेब सभन तिन हरी॥ आन मैन जब ताहि संतावै॥ पठै सहचरी न्रिपति बुलावै॥३॥ – रुकम कला रसभरी राणी सी, जिसदा जोबन सभ तों वध सी, जद राजा किसे होर वल धिआन देंदा, उह सहेलीआं राहीं उसनूं आपणे कोल बुला लैंदी सी।

दोहरा॥ क्रिसन कला इक सहचरी पठै दई न्रिप तीर॥ सो या पर अटकत भई हरिअरि करी अधीर॥४॥ – राणी ने क्रिसन कला सहेली नूं राजे कोल भेजिआ, पर उह रसते विच ही अटक गई जिस नाल राणी बेचैन ते चिंतित हो गई।

चौपई॥ सुनो न्रिपति जू बात हमारी॥ मै रीझी लखि प्रभा तिहारी॥ मै तव हेरि दिवानी भई॥ मो कह बिसर सकल सुधि गई॥५॥ – सहेली राजे नूं कहिंदी है कि मैं तेरे रूप ते किरपा नूं वेख के मोहित हो गई हां, मेरी सारी सुध बुध खो गई है।

दोहरा॥ सुधि भूली मोरी सभै बिरह बिकल भयो अंग॥ काम केल मो सौ करौ गहि गहि रे सरबंग॥६॥ – उह कहिंदी है कि मेरी सारी सुध बुध खो गई है, बिरह ने सरीर बेचैन कर दिता है, तूं मेरे नाल पूरे जोस़ नाल मिलाप कर।

चौपई॥ जब राजै ऐसे सुनि पायो॥ ता को भोग हेत ललचायो॥ लपटि लपटि ता सौ रति करी॥ चिमटि चिमटि आसन तन धरी॥७॥ – राजे ने इह गल सुण के लालच कीता अते सहेली नाल लपट लपट के रति (भोग) कीती, उसनूं चिमट के वखἑवख आसन बणाए।

चिमिट चिमिट ता सौ रति मानी॥ कामातुर ह्वै त्रिय लपटानी॥ न्रिप बर छिनिक न छोरियो भावै॥ गहि गहि ताहि गरे सौ लावै॥८॥ – राजा कामातुर हो के उस सहेली नाल चिमट चिमट के रति करदा रिहा, उह वी उसनूं लपटदी रही अते राजा इक पल लई वी उसनूं छडण लई तिआर ना सी।

दोहरा॥ भाति भाति आसन लए चुंबन करे बनाइ॥ चिमटि चिमटि भोगत भयो गनना गनी न जाइ॥९॥ – राजे ने उस सहेली नाल इंना मिलाप कीता कि वखἑवख आसन ते चुंबन करदे करदे गिणती ही नहीं रही कि किंनी वार भोग कीता।

सवैया॥ खाइ बंधेजन की बरियै न्रिप भाग चबाइ अफीम चड़ाई॥ पीत सराब बिराजत सुंदर काम की रीति सौ प्रीत मचाई॥ आसन और अलिंगन चुंबन भाति अनेक लीए सुखदाई॥ यौ तिह तोरि कुचान मरोरि सु भोर लगे झकझोरि बजाई॥१०॥ – राजे ने नस़े, अफीम अते मदरा दे प्रभाव विच डुब के उस सहेली नाल अनेक आसनां, अलिंगन अते चुंबनां नाल भोग कीता, इतना कि उसदे कुचां नूं मरोड़दा ते सवेर तक झकझोरदा रिहा।

अड़िल॥ रति मानी तिह संग न्रिपति हरखाइ कै॥ कामातुर ह्वै जात त्रिया लपटाइ कै॥ भाति भाति के आसन लए बनाइ करि॥ हो भोर होत लौ भजी हिये सुख पाइ करि॥११॥ – राजा कामातुर हो के उस सहेली नाल वखἑवख आसनां नाल रति करदा रिहा अते सवेर होण तक उसदे नाल मिलाप करदा सुख माणदा रिहा।

चौपई॥ बितई रैन भोर जब भई॥ चेरी न्रिपति बिदा कर दई॥ बिहबल भई बिसरि सभ गयो॥ ता का ओडि उपरना लयो॥१२॥ – सवेर होई तां राजे ने सहेली नूं रुख़सत कीता, पर उह इंनी बिहोस़ ते थकी होई सी कि सभ सुध भुल गई अते राजे दा उपरना ही पहिन के चली गई।

दोहरा॥ क्रिसन कला रति मानि कै तहा पहूची जाइ॥ रुकम कला पूछित भई ता कह निकटि बुलाइ॥१३॥ – क्रिसन कला रति माण के राणी कोल पहुंची ते रुकम कला ने कारन पुछिआ तां उसने उसनूं नेड़े बुला के सभ कुझ दसिआ।

प्रति उतर॥ सवैया॥ काहे कौ लेत है आतुर स्वास गई ही उताइल दौरी इहा ते॥ काहे कौ केस खुले लट छूटिये पाइ परी तव नेह के नाते॥ ओठन की अरुनाई कहा भई तेरी बडाई करी बहु भाते॥ कौन कौ अंबर ओढियो अली परतीति कौ लाई हौ लेहु उहा ते॥१४॥ – तूं इंनी बेचैन किउं है, साह चड़्हिआ होइआ है, किउंके मैं इथे दौड़दी आई हैं? तेरे वाल खुल्हे होए हन, लटां बिखरीआं हन, की तूं प्रेम दी खातर पैरी पै के आईं हैं? तेरे होठां दी लाली किथे गई? जिन्हां दी तूं बड़ी सांभ-संभाल करदी सी, उह रंग किवें मिट गिआ? तूं इह किहो जिहा उलझिआ होइआ अंबर किउं पाइआ है? दस, इह सारी हालत किस कारन बणी, किहड़ी घटना तों तूं इस तर्हां घबराई होई आई है?

दोहरा॥ सुनि बच रानी चुप रही जा के रूप अपार॥ छल को छिद्र न किछु लखियो इम छलगी बर नारि॥१५॥ – रानी ने गल सुणी तां चुप रहि गई, किउंकि उसदा रूप इंना अदभुत सी कि उसदी चुप वी इक जवाब वरगी लगदी सी। उसदे छल जां चालाकी दा कोई भेद नहीं खुलिआ, इह इस गल दा संकेत है कि इह इसत्री बहुत ही चतुर अते धोखा करन विच निपुंन सी।

इति स्री चरित्र पख्याने त्रिया चरित्रे मंत्री भूप संबादे इक सौ सठवो चरित्र समापतम सतु सुभम सतु॥१६०॥३१७१॥ – इस नाल त्रिया चरित्र दा १६० चरित्र, जो मंतरी अते राजे दे संबाद दे रूप विच है, इस दा अंत हुंदा है।

इस चरित्र विच रुकम कला आपणी सहेली क्रिसन कला नूं राजे कोल भेजदी है, पर सहेली आप ही राजे दे रूप ते मोहित हो के उस नाल रति कर बैठदी है। राजा नस़े अते काम विच डुब के उस नाल रात भर मिलाप करदा है, अते सवेर उह बेहोस़ी विच उसदा उपरना पा के वापस आ जांदी है। राणी उसदी बेतरतीब हालत देख के पुछदी है, पर सहेली सारा भेद चुपचाप राणी नूं नेड़े बुला के दसदी है। अंत विच राणी आपणी चालाकी अते छल नूं चुपी नाल ढक लैंदी है। जिहड़ी राणी आप चलाकी कर दूजीआं राणीआं कोल राजे नूं जाण नहीं दिंदी सी उह आप छली गई।

इस चरित्र दा नैतिक सार

इह चरित्र दिखाउंदा है कि काम, लालच अते मोह मनुख नूं अंन्हा कर दिंदे हन, अते चालाक लोक आपणी चुप अते रूप नाल वी धोखा छुपा लैंदे हन। इस विच चेतावनी है कि इंद्रीआं दे वस़ हो के कीता गिआ किरिआ-कलाप अकल, मरिआदा अते निरणे-स़कती नूं नस़ट कर दिंदा है।

चरितर बणदा है गुणां दे नाल। गुण हासल हुंदे हन मनुख दे हालात, उसदी संगत, उसदे निजी तजरबिआं नाल, उसदे गिआन नाल।

गुणां दी मति है गुरमति। गुणां दे गिआन नाल चरितर सवारिआ जांदा है। जिवें गुरबाणी आखदी है के "बिनु देखे उपजै नही आसा ॥ जदों अगिआनता हो जावे आस जाग जावे उसनूं काबू करन दा मारग है गिआन। चरितर दुआरा पातिस़ाह ने सपस़ट कीता है, समझाइआ है के वेखो भाई इह सब तुहाडे नाल वी हो सकदा है। धिआन रहे। बच के रहो।

आपणा चरितर देखण लई कोई स़ीस़ा नहीं हुंदा। तुसीं की करदे हों किवें सोचदे हों जदों कोई देख नहीं रहिआ हुंदा उस नाल तुहाडा चरितर पता लगदा है। तुहाडे अंदर की है, तुसीं गल कितनी सपस़ट करदेवहों, झूठ तां नहीं बोलदे, प्रधानगी दी, मस़हूर होण दी कितनी लालसा है इस नाल वी तुहाडा चरितर पता लगदा है। इमानदारी, निरपखदा, किरदार ते चरितर दी नींह हुंदी है। आचरण केवल बाहरी दिखावा हुंदा है सोझी तुहाडी काइआ दा प्रतिबिंब।


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