
Source: ਚਰਿਤ੍ਰੋਪਖ੍ਯਾਨ ਚਰਿਤ੍ਰ ਦੋ ਸੌ ਬਾਰਹ (੨੧੨) – Charitropakhyan charitra 212
चरित्र दोइ सौ बारह ἓ भैण दी आपणे भरा नूं रूप धार के धोखा देण दी कथा (गुरू गोबिंद सिंघ जी॥ चरित्रोपख्यान ॥ स्री दसम ग्रंथ साहिब जी महाराज)
अफजूं॥ दोहरा॥ सहिर बुखारा मै रहै एक राव मुचकंद॥ सूरत के भीतर गड़्रयो जनु दूजो बिधि चंद॥१॥ – सहिर बुखारा विच रहिण वाले राजा मुचकंद दी सुंदरता नूं चंद वरगी दूजी रौस़नी वांग बिआन कीता जादा सी।
हुसन जहा ता की त्रिया जा को रूप अपार॥ स्री सुकुमार मती रहै दुहिता तिह सुभ कार॥२॥ – उस देस़ दीआं औरतां बेहद सुंदर सन, अते राजे दी धी बहुत नाजुक सुभाउ वाली ते सोहणी सी।
एक पूत ता ते भयो स्री सुभ करन सुजानु॥ सूरबीर सुंदर सरस जानत सकल जहान॥३॥ – उस तों इक पुतर जंमिआ जो नेक, समझदार, सुंदर अते सारे संसार विच मस़हूर बहादर सी।
चलन चातुरी के बिखै चंचल चार प्रबीन॥ जनुक चित्र की पुत्रका गड़ि बिधि और न कीन॥४॥ – उह चाल-चलन अते चतुराई विच इंना निपुंन सी कि जिवें किसे ने चितर तों वेख के पुतली नूं बड़ी कला नाल गड़्ह दिता होवे।
चौपई॥ तरुन भ्रात भगनी भे दोऊ॥ राज करत न्रिप मरि गयो सोऊ॥ हुसन जहा बिधवा रहि गई॥ पति बिनु अधिक दुखातुर भई॥५॥ – भरा ते भैण दोवें जवान सन, राजा मर गिआ, राणी विधवा हो के पती दे बिना बहुत दुखी रहि गई।
मिलि साऊअन इह भाति उचारो॥ राज करो सुत तरुन तिहारो॥ मन को सोक निवारन कीजै॥ हेरि हेरि सुत की छबि जीजै॥६॥ – सहेलीआं ने किहा कि तेरा जवान पुतर राज करे, मन दा दुख छड दे अते उसदी सोहणी सूरत वेख के जी लगा लै।
केतिक दिवस बीति जब गए॥ राज करत सुख सौ ते भए॥ सुत सुंदर माता लखि पायो॥ राजा को चित ते बिसरायो॥७॥ – कुझ दिन बीतण उपरंत, पुतर राज करदा सुखी हो गिआ, मां ने उसदी सोहणी सूरत वेखी ते राजे दी याद वी भुल गई।
दोहरा॥ नरी गंध्रबी नागनी प्रभा बिलोकित आइ॥ सुरी आसुरी किंन्रनी हेरि रहत उरझाइ॥८॥ – उसदा नूर देख के मनुख, देवीआं, गंधरबणीआं, नागणीआं ते किंनरीआं सभ उसदी सोभा विच ही खो जादीआं सी।
हेरि कुअर की छबि सभै धंनि धंनि कहै पुकारि॥ मनि मोती कुंडल कनक देत तवन पर वारि॥९॥ – कुमार दी सोहणी सूरत वेख के सभ लोक धंन-धंन करदे अते खुस़ी नाल मोती ते सोने वरगे गहिणे उस उते वारदे सन। उसते निऊछावर करदे सी।
अड़िल॥ ऐसो कुअर एक दिन जौ सखि पाइयै॥ जनम जनम इह ऊपर बलि बलि जाइयै॥ उर भए लेहि लगाइ न न्यारो कीजियै॥ हो निरखि निरखि छबि अमित सजन की जीजियै॥१०॥ – कई इसतरीआं सोचदीआं सी जे किसे नूं इक दिन वी इहो जिहा सुंदर कुमार मिल जावे, तां उह जनम जनम उस उते कुरबान कर देण, उसदी बेअंत सोभा वेख के मन उस नाल ही जुड़िआ रहे।
जि को तरुनि पुरि नारि कुअर की छबि लहै॥ उड लपटों इह संग यहे चित मै कहै॥ एक बार इह छैल चिकनियहि पाइयै॥ हो जनम जनम जुग क्रोरि सु बलि बलि जाइयै॥११॥ – जो वी जवान औरत उस कुमार दी सोभा वेखदी, मन ही मन कहिंदी कि जे इक वार इह सुंदर नौजवान मिल जावे, तां जनम जनम उस ते कुरबान हो जावे।
अधिक कुअर की प्रभा बिलोकहि आइ कै॥ जोरि जोरि द्रिग रहै कछू मुसकाइ कै॥ परम प्रीति तन बिधी दिवानी ते भई॥ हो लोक लाज की बात बिसरि चित ते गई॥१२॥ – कुमार दी सोभा वेख के औरतां जोरἑजोर नाल तकदीआं, हौली मुसकाउंदीआं अते उसदी प्रीत विच पागल हो के लोक-लाज वी भुल जांदीआं सी।
नरी सुरी किन माहि आसुरी गंध्रबी॥ कहा किंन्रनी कूर जछनी नागनी॥ लछमि आदि दुति हेरि रहै उरझाइ कै॥ हो बिनु दामन कै दीए सु जात बिकाइ कै॥१३॥ – मनुख, देवीआं, असुरणां, गंधरबणीआं, किंनरीआं, यकस़णीआं, नागणीआं, इह सभ उसदी सोभा विच इंनी फस गईआं कि लाज भुल के बिना कुझ लएἑदए ही आपणे आप नूं उस ते वार देण नूं तिआर हो गईआं।
रही चंचला रीझयति प्रभा निहारि कै॥ प्रानन लौ धन धाम देत सभ वारि कै॥ हसि हसि कहै कुअर जौ इक दिन पाइयै॥ हो बहुर न न्यारो करियै हियै लगाइयै॥१४॥ – चंचला उसदी रौस़नी वेख के मोहित हो जावे, प्राण ते धन सभ कुझ वार देण नूं तिआर हो के हसदिआं कहिंदी कि जे इह कुमार इक दिन वी मिल जावे तां फिर कदे वी उस तों वखरी ना होवे।
दोहरा॥ स्री सुकुमार मती बहनि ता की राज कुमारि॥ अप्रमान छबि भ्रात की रीझत भई निहारि॥१५॥ – राजकुमारी, जो सुभाउ विच नरम ते बुधिमान सी, आपणे भरा दी अपार सोभा वेख के उस उते मोहित हो गई।
चौपई॥ निसु दिन यौ मन माहि बिचारै॥ किह बिधि मौ सौ कुअर बिहारै॥ भ्रात लाज मन महि जब धरै॥ लोक लाज की चिंता करै॥१६॥ – उह राजकुमारी रातἑदिन सोचदी रहिंदी कि किस तरीके नाल मैं इस कुमार नाल मिल सकां, पर भरा दी लाज अते लोक-लाज उसदे मन नूं रोकदी रहिंदी सी।
लाज करै अरु चित चलावै॥ क्यो हूं कुअर हाथ नहि आवै॥ इक चरित्र तब बचित्र बिचारियो॥ जा ते धरम कुअर को टारियो॥१७॥ – उह लाज वी करदी सी पर मन चलाकीआं वी सोचदा सी, कि किस तर्हां इह कुमार मेरे हथ आ सके। आख़िर उसने इक अजिहा चतुर चरित्र सोचिआ जिस नाल कुमार दा धरम डोल सके।
बेस्वा रूप आपनो करियो॥ बार बार गज मोतिन जरियो॥ हार सिंगार चारु तन धारे॥ जन ससि तीर बिराजत तारे॥१८॥ – उसने आपणे आप नूं वेस़िआ दे रूप विच सजाइआ, वारἑवार मोती ते गजरे पा के सुंदर सिंगार कीता, ते चंद वरगे रूप उते तारिआं वरगे गहिणे सजा लए।
पान चबात सभा मै आई॥ सभ लोगन कौ लयो लुभाई॥ न्रिप कह अधिक कटाछ दिखाए॥ जानुक बिना साइकन घाए॥१९॥ – उह पान चबांदी होई सभा विच आई, सभ नूं मोह लिआ, राजे वल वारἑवार तीखे नैनां नाल तकिआ, जिवें बिना तीर चलाए ही किसे नूं घाइल कर देवे।
हेरत न्रिपत रीझि छबि गयो॥ घाइल बिना साइकन भयो॥ आजु निसा इह बोल पठैहो॥ काम भोग रुचि मानि कमैहो॥२०॥ – राजा उसदी सोभा वेख के मोहित हो गिआ, बिना तीर दे ही घाइल वरगा हो गिआ, अते कहिण लगा कि अज रात इसनूं सुनेहा भेजो काम भोग दी इछा पूरी करांगा।
बीतयो दिवस निसा जब भई॥ निकटि बुलाइ कुअर वहु लई॥ काम भोग तिह साथ कमायो॥ भेद अभेद कछू नहि पायो॥२१॥ – उह राजकुमारी उस कुमार नाल इंनी लगन नाल लपटदी रही कि रसἑरंग विच पूरी तर्हां डुब गई; भराἑभैण वाला भेद उहनां विचों किसे नूं वी समझ ना आ सकिआ। भैण भरा वाली मरिआदा ना रही।
दोहरा॥ लपटि लपटि ता सो कुअरि रति मानी रुचि मानि॥ भ्रात भगनि के भेद को सकत न भयो पछान॥२२॥ – उह कुआरी (कुमारी) लड़की पिआर नाल लपट के उहदी प्रेम विच डुबी रही। उसने भरा ते भैण दा भेद नहीं पछाणिआ।
सोरठा॥ रमत भयो रुचि मानि भेद अभेद पायो न कछु॥ छैली छल्यो निदान छैल चिकनिया राव को॥२३॥ – उह दोवें रसἑरंग विच इंने डुबे रहे कि भेदἑअभेद कुझ वी समझ ना आइआ; आख़िरकार उह चतुर छैली उस सुंदर छैल राजे नूं पूरी तर्हां छल गई
चौपई॥ बेस्वा के भूखन जब धरै॥ निस दिन कुअर कलोलै करै॥ जब भगनी के भूखन धरई॥ लहै न को राजा को करई॥२४॥ – जदों उह वेस़िआ वाले गहिणे पांदी सी, तां राजकुमार रातἑदिन उस नाल कलोल करदा भोग करदा रहिंदा सी। पर जदों उह भैण वाले गहिणे पांदी, तां राजा उसदे नेड़े जाण दी हिंमत वी नहीं करदा सी।
इति स्री चरित्र पख्याने त्रिया चरित्रे मंत्री भूप संबादे दोइ सौ बारह चरित्र समापतम सतु सुभम सतु॥२१२॥४०७४॥ – इस तर्हां ‘चरित्र पख्यान’ दे ‘त्रिया चरित्र’ विच मंतरी ते भूप दा संवाद चरितर २१२ दी समापती होई।
इस चरित्र दा नैतिक सार
इह सारी कहाणी इक गहिरा समाजिक संदेस़ दिंदी है
१. धोखा हमेस़ा बाहरी रूप तों स़ुरू हुंदा है – जदों असीं सिरफ़ दिखावे ते फ़ैसले करदे हां, अकल हार जांदी है।
२. कामना मनुख नूं अंन्हा कर दिंदी है। जिथे इछा हावी हो जावे, उथे सहीἑगलत दी पहिचाण मिट जांदी है।
३. रूप, भेस अते चलाकी मन नूं इस कदर भटका सकदे हन कि सभ तों नेड़े अते पाक रिस़ते दा भेद वी समझ नहीं आउंदा।
४. कहाणी सिखाउंदी है कि सावधानी, संयम अते अंदरूनी सूझ बिना मनुख आसानी नाल छल दा स़िकार बण जांदा है। काम किवें रिस़तिआं दी मरिआदा दा वी उलंघन करवा दिंदा है॥
इह चरित्र दसदा है कि धोखा अकसर रूप अते दिखावे तों स़ुरू हुंदा है, अते जदों मनुख कामना जां लालच विच फस जांदा है, तां उसदी सूझἑबूझ कमज़ोर हो जांदी है। राजकुमारी ने भेस बदल के राजे नूं मोह लिआ, अते राजा उसदी सोभा विच इंना डुब गिआ कि सचἑझूठ, भेदἑअभेद कुझ वी समझ ना सकिआ। इह कहाणी दिखाउंदी है कि जदों मनुख आपणीआं इछावां दे वस हो जांदा है, तां उह सभ तों नेड़े दे रिस़तिआं दी पहिचाण वी गुआ बैठदा है। दसम ग्रंथ दे चरित्र नैतिक, मनोविगिआनक अते समाजिक सिखिआ देण लई रचे गए हन इहनां दा उदेस़ मनुखी कमज़ोरीआं, धोखे, कामना अते सावधानी बारे सिखिआ देणा है। इस लई इह कहाणी नैतिक रूपक है। अज वी समाज विच दखण भारत विच सगे मामे दे नाल कुड़ी दा विआह कर दिता जांदा है। कई सगे भैण भरा समाज विच आपस विच विआह करवा लैंदे हन। करी विदेस़ जाण लई वी इह करदे हन। करी देस़ा विच ५ साल दी बची नूं ५० साल दे मनुख कोल वेच दिता जांदा है। कई देस़ा विच ८ साल दी बची नाल विआह कानूंन विच सही मंनिआ गिआ है। इह सब गलत हन। इह सब मनुख दे किरदार विच काम दी खिच दरसाउंदे हन।
चरितर बणदा है गुणां दे नाल। गुण हासल हुंदे हन मनुख दे हालात, उसदी संगत, उसदे निजी तजरबिआं नाल, उसदे गिआन नाल।
गुणां दी मति है गुरमति। गुणां दे गिआन नाल चरितर सवारिआ जांदा है। जिवें गुरबाणी आखदी है के "बिनु देखे उपजै नही आसा ॥ जदों अगिआनता हो जावे आस जाग जावे उसनूं काबू करन दा मारग है गिआन। चरितर दुआरा पातिस़ाह ने सपस़ट कीता है, समझाइआ है के वेखो भाई इह सब तुहाडे नाल वी हो सकदा है। धिआन रहे। बच के रहो।
आपणा चरितर देखण लई कोई स़ीस़ा नहीं हुंदा। तुसीं की करदे हों किवें सोचदे हों जदों कोई देख नहीं रहिआ हुंदा उस नाल तुहाडा चरितर पता लगदा है। तुहाडे अंदर की है, तुसीं गल कितनी सपस़ट करदेवहों, झूठ तां नहीं बोलदे, प्रधानगी दी, मस़हूर होण दी कितनी लालसा है इस नाल वी तुहाडा चरितर पता लगदा है। इमानदारी, निरपखदा, किरदार ते चरितर दी नींह हुंदी है। आचरण केवल बाहरी दिखावा हुंदा है सोझी तुहाडी काइआ दा प्रतिबिंब।

Source: ਚਰਿਤ੍ਰੋਪਖ੍ਯਾਨ ਚਰਿਤ੍ਰ ਦੋ ਸੌ ਬਾਰਹ (੨੧੨) – Charitropakhyan charitra 212