
Source: ਚਰਿਤ੍ਰੋਪਖ੍ਯਾਨ ਚਰਿਤ੍ਰ ਇਕ ਸੌ ਚੌਤੀ (੧੩੪) – Charitropakhyan charitra 134
चरित्र इक सौ चौतीसवो – बलातकारी अतताई राजे नूं सजा दी कथा (गुरू गोबिंद सिंघ जी॥ चरित्रोपख्यान ॥ स्री दसम ग्रंथ साहिब जी महाराज)
अफजूं॥ चौपई॥ सबक सिंघ राजा इक भारी॥ बाज मती ता की बर नारी॥ काहू सो नहि राव लजावै॥ सभ इसत्रिन सो केल कमावै॥१॥ – सबक सिंघ इक वडा राजा सी, उस दी पतनी बाज मती सी जो बहुत चंगी औरत सी। राजा किसे तों लजांदा नहीं सी ते बहुतीआं इसतरीआं नाल काम विहार करदा सी।
जो इसत्री तिह कहे न आवै॥ ता की खाट उठाइ मंगावै॥ अधिक भोग ता सो न्रिप करई॥ रानी ते जिय नैक न डरई॥२॥ – जो इसत्री राजे दी गल नहीं मंनदी सी राजा उहदी खाट/मंजा/सेज ही चकवा लैंदा सी। उस दे नाल जोर जबर नाल भोग-विलास करदा सी ते आपणी राणी तों बिलकुल संकोच नहीं करदा सी।
बाज मती जिय अधिक रिसावै॥ सबक सिंघ पर कछु न बसावै॥ तब त्रिय एक चरित्र बिचारियो॥ राजा को दुरमति ते टारियो॥३॥ – बाज मती नूं इह चंगा नहीं लगदा सी। उह राजे नूं किसे तरीके दा सबक नहीं दिंदी सी। बाज मती ने इक चरितर रचन दा सोचिआ राजे नूं दुरमति दुराचार तों रोकण दा।
रूपवती जो त्रिय लखि पावै॥ सबक सिंघ सो जाइ सुनावै॥ तुम राजा तिह त्रिया बुलावो॥ काम केल तिह साथ कमावो॥४॥ – जो इसत्री रूपवती हो जांदी सी, राजा बुला लैंदा सी। राणी ने इक इसत्री वल इस़ारा कीते ते उस नाल केल करन नूं आखिआ।
जब यौ बचन राव सुनि पावै॥ तौन त्रिया को बोलि पठावै॥ जा की रानी प्रभा उचारै॥ ता के राजा संग बिहारै॥५॥ – जदों राजा इह बचन सुणदा है, उह तुरंत उस इसतरी नूं बुलाउण लई आखदा है
या मै कहो कहा घट गई॥ जानुक होहूं भिटोअनि भई॥ जा ते मोर राव सुख पावै॥ वहै बात हमरे जिय भावै॥६॥ – राणी कहिंदी है जे मेरे कारन उसनूं सुख मिलदा है, तां जो वी गल उसदे मन नूं चंगी लगे, उही मैनूं वी मनज़ूर है।
बली एक सुंदर लखि पायो॥ प्रथम तवन की त्रियहि भिटायो॥ जब वहु पुरख अधिक रिसि भरियो॥ तब ता सो यौ बचन उचरियो॥७॥ – इक बली ते सुंदर मरद नूं वेख के, राणी ने पहिलां उसदी इसतरी नूं राजे कोल भेजिआ, पर जदों उह मरद बहुत गुसे नाल भर गिआ, तदों राणी ने इह बचन कहे।
दोहरा॥ काम केल ता सौ करियो रानी अति सुख पाइ॥ बहुरि बचन तिह पुरख सो ऐसो कहियो सुनाइ॥८॥ – राणी ने उस मरद नाल काम-केल कीता अते बहुत सुख पाइआ, फिर उस मरद नूं इह बचन सुणाए ।
चौपई॥ तुमरी प्रभा कहो का रही॥ निज नारी राजै जो चही॥ जा की त्रिय सो और बिहारै॥ ध्रिग ता को सभ जगत उचारै॥९॥ – हुण तेरी इजत की रही तेरी इसतठी नाल तां राजे ने भोग बिलास कर लिआ। जिसदी नार किसे दूजे मरद नाल बिउहार कर लए तां सारा जगत उसदे जीवन नूं ध्रिग आखदा है।
दोहरा॥ प्रथम भोग मन भावतो रानी कियो बनाइ॥ बहुरि बचन ता सौ कहियो ऐसे रिस उपजाइ॥१०॥ – पहिलां मन भावना भोग राणी ने उस मनुख नाल कीता फेर उस विच गुसे दी भावना जगा दिती।
चौपई॥ तुमरी त्रिय कौ राव बुलावै॥ काम भोग तिह साथ कमावै॥ तू नहि मरियो लाज को मरई॥ पावक बिखै जाइ नहि जरई॥११॥ – राणी उसनूं आखदी के राजा तेरी इसत्री नाल भोग कमा रहिआ है ते तूं लाज नाल नहीं मरिआ। तेरे तों इह गल किवें बरदास़त हो रही है।
दोहरा॥ कै यह मूरख राव ते बदलो लेहि बनाइ॥ नातर बद्रिकास्रम बिखै गरौ हिमाचल जाइ॥१२॥ – राणी ने कहिआ की इह मूरख राजे तों बदला लै के आपणी इज़त बचा लए, नहीं तां बदरीक आस़रम जां हिमालिआ विच जा के ज़हिर खा लए।
चौपई॥ जो त्रिय कहो मोहि सो करौ॥ सबक सिंघ ते नैक न डरौ॥ इन कीनो ग्रिह ख्वार हमारो॥ मैहूं तिह त्रिय संग बिहारो॥१३॥ – उस मरद ने कहिआ जो तूं कहेंगी मैं करांगा, तूं दस मैं बदला किवें लवां। राजे ने मेरा घर खराब कीता है ते मैं उसदी इसतरी नाल वी बिउहार कीता है।
रोमातक तुम प्रथम लगावो॥ सकल त्रिया कौ भेस छकावो॥ जब तुम कौ राजा लखि पै है॥ तुरतु मदन के बसि ह्वै जै है॥१४॥ – राणी ने कहिा पहिलां तूं रोमातक आपणे सरीर दे रोम (बालां) ते ला, फेर सुंदर इसतरी दा भेस धर। जदों राजा तैनूं वेखेगा तां उह तुरंत तेरे ते मोहित हो जाणा।
जार केस सभ दूरि कराए॥ भूखन अंग अनूप सुहाए॥ जाइ दरस राजा को दियो॥ न्रिप को मोहि आतमा लियो॥१५॥ – उस ने आपणे सारे सरीर दे रोम हटा दिते ते सुंदर गहिणे पा लए। राजे मुहरी इसतरी दे भेख विच गिआ ते उसदा मन मोह लिआ।
जब राजै ता को लखि पायो॥ दौरि सदन रानी के आयो॥ हे सुंदरि मै त्रियिक निहारी॥ जानुक महा रुद्र की प्यारी॥१६॥ – जदों राजे ने उसनूं वेखिआ, उह तुरंत राणी दे महिल वल दौड़िआ अते किहा के मैनूं इक बहुत सुंदर इसतरी दिखी है जो रूद्र दा रूप लग रही है।
जो मुहि तिह तू आज मिलावैं॥ जो मागै मुख ते सो पावैं॥ रानी फूलि बचन सुनि गई॥ जो मै चाहत थी सोऊ भई॥१७॥ – राजे ने किहा, जे तूं अज मैनूं उस नाल मिलावें, तां जो कुझ तूं मूंह नाल मंगेंगी, उह सभ तैनूं मिलेगा; इह सुण के राणी खुस़ हो गई किउंकि जो उह चाहुंदी सी, उही हो रिहा सी।
सुनत बचन रानी ग्रिह आई॥ तौन जार को दयो भिटाई॥ जब ता को न्रिप हाथ चलायो॥ पकरि राव को तरे दबायो॥१८॥ – राणी इह बचन सुण के घर आई अते आपणे राजे नूं उस इसतरी दा भेख कीते मरद नाल मिलाइआ; पर जदों राजे ने उस Ἑते हथ चलाइआ, तां उस पुरूस़ ने राजे नूं पकड़ के ज़मीन Ἑते दबोच लिआ।
न्रिप को पकरि भुजन ते लियो॥ गुदा भोग ता को द्रिड़ कियो॥ तोरि तारि तन रुधिर चलायो॥ अधिक राव मन माझ लजायो॥१९॥ – उस जार ने राजे नूं पकड़ के आपणीआं बांहां नाल ज़ोर नाल जकड़ लिआ, उस नाल गुदा (पिछले मल धाम तों) भोग कीता, उसदा सरीर तोड़ मरोड़ के खून वगा दिता, अते राजा मन ही मन बहुत लजा महिसूस कीती।
दोहरा॥ गुदा भोग भे ते न्रिपति मन महि रहियो लजाइ॥ ता दिन ते काहूं त्रियहि लयो न निकटि बुलाइ॥२०॥ – राजा (न्रिपति) इक स़रमनाक भोग दी घटना कारन मन विच बहुत लजिआ होइआ सी। उस दिन तों उसने किसे वी इसतरी नूं आपणे नेड़े नहीं आउण दिता।
इति स्री चरित्र पख्याने त्रिया चरित्रे मंत्री भूप संबादे इक सौ चौतीसवो चरित्र समापतम सतु सुभम सतु॥१३४॥२६७२॥ – इन्हां चरित्रां विचों इस मंतरी अते भूप (राजा) दी गलबात वाला 134वां चरित्र खतम होइआ, इह सुभ शुरूआत ते सुभ अंत होइआ।
इस चरित्र दा नैतिक सार
इह प्रसंग साडे समाज विच होण वाले यौन स़ोस़ण बारे दसदा है। राजा जां रसूक वाले लोग अज वी पराई इसत्री नूं धी भैण ना जाण के दुराचार करदे हन। इह समाज दा इक बेहद दरदनाक रूप है। लोक इसत्रीआं दे कपड़े अंदर की है झांक के वेखण दी कोस़िस़ करदे हन। भावें बाहरों भेख संतां वाला कीता होवे। काम ग्रसत इहो जिहे लोक समाज विच इसत्रीआं दा स़ोस़ण करदे हन। राजे नाल जदों आप उहो जिही घटना घटी तां उसनूं लजा महिसूस होई। हो सकदा है के लोकां नूं लगे राजे नूं सजा बहुत घट मिली पर इस चरितर दा मकसद इह समझाउणा है के कई वार जदों तक मनुख जो दूजे नाल करदा है अतपणे नाल होण तक सिखदा नहीं।
चरितर बणदा है गुणां दे नाल। गुण हासल हुंदे हन मनुख दे हालात, उसदी संगत, उसदे निजी तजरबिआं नाल, उसदे गिआन नाल।
गुणां दी मति है गुरमति। गुणां दे गिआन नाल चरितर सवारिआ जांदा है। जिवें गुरबाणी आखदी है के "बिनु देखे उपजै नही आसा ॥ जदों अगिआनता हो जावे आस जाग जावे उसनूं काबू करन दा मारग है गिआन। चरितर दुआरा पातिस़ाह ने सपस़ट कीता है, समझाइआ है के वेखो भाई इह सब तुहाडे नाल वी हो सकदा है। धिआन रहे। बच के रहो।
आपणा चरितर देखण लई कोई स़ीस़ा नहीं हुंदा। तुसीं की करदे हों किवें सोचदे हों जदों कोई देख नहीं रहिआ हुंदा उस नाल तुहाडा चरितर पता लगदा है। तुहाडे अंदर की है, तुसीं गल कितनी सपस़ट करदेवहों, झूठ तां नहीं बोलदे, प्रधानगी दी, मस़हूर होण दी कितनी लालसा है इस नाल वी तुहाडा चरितर पता लगदा है। इमानदारी, निरपखदा, किरदार ते चरितर दी नींह हुंदी है। आचरण केवल बाहरी दिखावा हुंदा है सोझी तुहाडी काइआ दा प्रतिबिंब।

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