Source: ਚਰਿਤ੍ਰੋਪਖ੍ਯਾਨ ਚਰਿਤ੍ਰ ਚਾਰ ਸੌ ਦੋਇ (੪੦੨) – Charitropakhyan charitra 402

चरित्रोपख्यान चरित्र चार सौ दोइ (४०२) ἓ Charitropakhyan charitra 402

चरित्र तीन सौ पचीस ἓ कथा काम वासना विच किवें इक राजा त्रीआ चरितर दे वस विच हो जांदा हैἦ (गुरू गोबिंद सिंघ जी॥ चरित्रोपख्यान ॥ स्री दसम ग्रंथ साहिब जी महाराज)

अफजूं॥ चौपई॥ चिंजी सहर बसत है जहा॥ चिंगस सैन नराधिप तहा॥ गैहर मती नारि तिह कहियत॥ जिह सम सुर पुर नारि न लहियत॥१॥ – चिंजी स़हिर विच चिंगस नाम दा राजा रहिंदा सी। उसे स़हिर विच गहिर मती नाम दी इसत्री वी रहिंदी सी जो बहुत ही कामातुर सी। उह ऐसी सुंदर इसत्री सी जो देवतिआं दे स़हिर विच वी नहीं मिलदी।

सहर सुरेस्वावती बिराजै॥ जा कौ निरखि इंद्र पुर लाजै॥ बलवंड सिंघ साह इक सुनियत॥ जिह समान जग और न गुनियत॥२॥ – इंज लगदा सी के सरसवती आप मुहरे खड़ी होवे। जिसनूं वेख के इंदर दे स़हिर दीआं इसत्रीआं वी फिकीआं लगण। बलवंड सिंघ नाम दा इक बहुत ही बहादर अते गुणवान योधा सी जिस वरगा होर कोई जगत विच नहीं सी।

सदा कुअरि तिह सुता भनिजै॥ चंद्र सूर लखि जाहि अरुझै॥ अप्रमान दुति जात न कही॥ जानुक फूलि चंबेली रही॥३॥ – उह सदा कुआरी वरगी लगदी सी, चंद अते सूरज वी उसदी सोभा दे अगे मंद पै जांदे सी। उसदी अपार कांती बिआन तों परे सी, जिवें पूरी तर्हां खिड़ी होई चंबेली दा फुल होवे।

सदा कुअरि निरखा जब राजा॥ तब ही सील तवन का भाजा॥ सखी एक न्रिप तीर पठाई॥ यौ राजा तन कहु तै जाई॥४॥ – जदों राजे ने उसनूं सदा कुआरी वरगी देखिआ, तां उसदा सीलἑसुभाउ अते तपसिआ दा तेज उसनूं तुरंत प्रभावित कर गिआ। उस ने इक सखी नूं राजे दे तीर नाल भेजिआ कि जा के कहे "राजा तैनूं आपणे कोल बुला रिहा है।

मै तव रूप निरखि उरझानी॥ मदन ताप ते भई दिवानी॥ एक बार तुम मुझै बुलावो॥ काम तपत करि केल मिटावो॥५॥ – मैं तेरा रूप देख के उस विच उलझ गई हां। प्रेम दी अग विच पागल हो गई हां। इक वारी मैनूं सद लै अते काम दी तपश मिटा दे।

जौ आपन ग्रिह मुहि न बुलावहु॥ एक बार मोरे ग्रिह आवहु॥ मो संग करियै मैन बिलासा॥ हम कह तोरि मिलन की आसा॥६॥ – जे तुसीं आपणे घर (ही) मैनूं नहीं बुलाउंदे, तां इक वारी तां मेरे घर आ जाओ। मेरे नाल मिल के मन दी खुशी प्रापत कर लओ। मैं तां तुहाडे मिलाप दी आस रखदी हां।

भूप कुअरि वहु ग्रिह न बुलाई॥ आपु जाइ तिह सेज सुहाई॥ दीप दान तरुनी तिन कीना॥ अरघ धूप राजा कह दीना॥७॥ – राजे ने कुआरी नूं आपणे घर नहीं बुलाइआ; उह आप ही उसदी सुहावणी सेज Ἑते आ बैठी। उस कुमारी ने दीवा, दान आदि दीआं सेवावां कीतीआं अते राजे नूं अरघ ते धूप भेट कीती।

सुभर सेज ऊपर बैठायो॥ भाग अफीम सराब मंगायो॥ प्रथम कहा न्रिप सौ इन पीजै॥ बहुरि मुझै मदनंकुस दीजै॥८॥ – उसने उसनूं सुंदर सेज Ἑते बिठाइआ अते भाग, अफीम ते स़राब मंगवाई। पहिलां कहिआ "राजा इह पीए, फिर किहा "फिर मैनूं मदन दा अंकुस़ (कामἑउतेजना) दिओ।

सुनत बचन इह भूप न माना॥ जम के डंड त्रास तरसाना॥ कहियो न मै तौसौ रति करिहो॥ घोर नरक मो भूलि न परिहौ॥९॥ – इह बचन सुण के राजा नहीं मंनिआ; उसनूं जम दे डंड वरगा डर लगा। उसने कहिआ "मैं तेरे नाल भोग नहीं करांगा, किउंकि मैं घोर नरक विच भुल के वी नहीं पैणा चाहुंदा।

तिमि तिमि त्रिय अंचर गरि डारै॥ जोरि जोरि द्रिग न्रिपहि निहारै॥ हाइ हाइ मुहि भूपति भजियै॥ काम क्रिया मोरे संग सजियै॥१०॥ – उह इसत्री वारἑवार आपणा अंचल खोल्ह के उस Ἑते सुटदी है अते बार बार राजे वल तकदी है। कहिंदी है "हाए हाए, राजा मेरे तों भज रिहा है; आओ, मेरे नाल कामἑक्रिया करो।

नहि नहि पुनि जिमि जिमि न्रिप करै॥ तिमि तिमि चरन चंचला परै॥ हहा न्रिपति मुहि करहु बिलासा॥ काम भोग की पुरवहु आसा॥११॥ – राजा जिवेंἑजिवें इनकार करदा है, उह इसत्री उन्हां ही वारἑवार उसदे पैरां Ἑते डिगदी है। कहिंदी है "हाए राजन, मेरे नाल बिलास करो; मेरी कामἑइछा पूरी करो।

कहा करौ कहु कहा पधारौ॥ आप मरौ कै मुझै संघारौ॥ हाइ हाइ मुहि भोग न करई॥ ता ते जीअ हमारा जरई॥१२॥ – उह कहिंदी है "मैं की करां, किथे जावां? की मैं आप मर जावां जां तूं मैनूं मार दे। हाए हाए, राजा मेरे नाल भोग नहीं करदा; इस करके मेरा जीअ अंदरों सड़ रिहा है। इह पंकतीआ उस इसत्री दी अति कामातुरता, बेसमझी अते अंदरली बेचैनी नूं दरसाउंदीआं हन। उह राजे दे इनकार नूं सहि नहीं सकदी अते उसदी वास़ना उसनूं तरस, रोणा अते धमकी तक लै आउंदी है।

सवैया॥ आसन और अलिंगन चुंबन आजु भले तुमरे कसि लैहौ॥ रीझि हैं जौन उपाइ गुमानी तैं ताहि उपाइ सो तोहि रिझैहौ॥ पोसत भाग अफीम सराब खवाइ तुमै तब आपु चड़ैहौ॥ कोट उपाव करौ क्यो न मीत पै केल करे बिनु जान न दैहौ॥१३॥ – उह आखदी तुसीं मैनूं आपणे आलिंगन विच लै लवो ते वख आसन, चुंबन नाल भर लवो। तैनूं जिहड़ा गुमान है मैं तुहानूं किहड़े उपा नाल रिझावस़। भंग, अफीम, शराब आदि दे के वी जे प्रभाव चड़्हदा है तां वी कर लवो। लख तरीके अपनाउण ते वी तुसीं मेरे नाल केल किउं नहीं करदे। मैं वी तुहानूं जाण नहीं देणा।

केतियै बात बनाइ कहौ किन केल करे बिनु मै न टरौगी॥ आजु मिले तुमरे बिनु मै तव रूप चितारि चितारि जरौगी॥ हार सिंगार सभै घर बार सु एकहि बार बिसारि धरौगी॥ कै करि प्यार मिलो इक बार कि यार बिना उर फारि मरौगी॥१४॥
-तुसीं जो मरजी गल करो बहाना बचाओ मैं तुहानूं केल कीते बिनां जाण नहीं देणा। जे अज तूं ना मिलिआ तां तेरा रूप सोच सोच के सड़दी रहांगी। सारे गहिणे सिंगार ते घर बार इक वार विच ही छड देवांगी। इक वार पिआर नाल मिल लै, नहीं तां तेरे बिना दिल चीर के मर जावांगी।

सुंदर केल करो हमरे संग मै तुमरौ लखि रूप बिकानी॥ ठाव नही जहा जाउ क्रिपानिधि आजु भई दुति देख दिवानी॥ हौ अटकी तव हेरि प्रभा तुम बाधि रहै कसि मौन गुमानी॥ जानत घात न मानत बात सु जात बिहात दुहूंन की ज्वानी॥१५॥ – मेरे नाल सुंदर खेड करो, मैं तेरा रूप वेख के मोहित हो गई हां। किते वी ठिकाणा नहीं, जिथे जावां अज तेरी किरपा दी जोत वेख के पागल हो गई हां। तेरी चमक वेख के मैं रुक गई हां, तेरा मौन तेरा गरूर मैनूं बंन्ह के रखदा है। तूं मेरा दुख जाणदा वी हैं पर गल मंनदा नहीं, इस तर्हां दोवां दी जवानी विअरथ जा रही है।

जेतिक प्रीति की रीति की बात सु साह सुता न्रिप तीर बखानी॥ चौक रहा चहूं ओर चितै करि बाधि रहा मुख मौन गुमानी॥ हाहि रही कहि पाइ रही गहि गाइ थकी गुन एक न जानी॥ बाधि रहा जड़ मोनि महा ओहि कोटि कही इह एक न मानी॥१६॥ – जिंनी वी प्रीत दीआं रीतां सन, राजे ने सभ तीर वांग साफ़ कहि दितीआं। राजा चारों पासे तकदा चुप बैठा रिहा, मौन ते गरूर ने उसनूं बंन्ह रखिआ सी। उह रोई, बेनती कीती, पैर फड़े, गले लगी, थक गई पर राजे ने इक वी गल ना समझी। उह जड़ वांग मौन विच बंन्हिआ रिहा, लख बेनतीआं होईआं पर इक वी गल ना मंनी

चौपई॥ जब भूपति इक बात न मानी॥ साह सुता तब अधिक रिसानी॥ सखियन नैन सैन करि दई॥ राजा की बहीया गहि लई॥१७॥ – जदों राजा ने इक गल ना मंनी, तां रोस वध गिआ। महिला ने आपणीआं सहेलीआं नूं अखीआं नाल इशारा कीता अते राजे दी बांह फड़ लई।

पकरि राव की पाग उतारी॥ पनही मूंड सात सै झारी॥ दुतिय पुरख कोई तिह न निहारौ॥ आनि राव कौ करै सहारौ॥१८॥ – राजे दी पग फड़ के उतार लई, अते आपणी पनहीं (पैर दी जुती) सिर Ἑते सौ वार मारी। उह आखदी मैं किसे होर मरद वल़ तकदी वी नहीं। राजे दे इलावा कोई सहारा नहीं चाहीदा।

भूप लजत नहि हाइ बखानै॥ जिनि कोई नर मुझै पछानै॥ साह सुता इत न्रिपहि न छोरै॥ पनही वाहि मूंड पर तोरै॥१९॥ – राजा बहुत बेइजत होइआ। उसने बहुत स़रम महिसूस कीती पर कुझ बोल ना सकिआ। इह इसत्री राजे नूं इंझ नहीं छडदी अते आपणी पनहीं सिर Ἑते मार के तोड़ दिंदी है।

राव लखा त्रिय मुझै संघारो॥ कोई न पहुचा सिवक हमारो॥ अब यह मुझै न जानै दै है॥ पनी हनत म्रित लोक पठै है॥२०॥ – राजा समझदा है कि इह इसत्री मैनूं ही मार देवेगी। मेरा कोई सेवक वी इथे मेरी मदद लई नहीं पहुंचिआ। हुण इह मैनूं जाण वी नहीं दिंदी। आपणी पनहीं नाल मैनूं मार के परलोक भेजणा चाहुंदी है।

पनही जब सोरह सै परी॥ तब राजा की आखि उघरी॥ इह अबला गहि मोहि संघरि है॥ कवन आनि ह्यां मुझै उबरि है॥२१॥ – जद उसदी पनहीं सिर Ἑते पई तद राजे दी अख खुल गई ते उह कहिंदा है इह इसत्री मैनूं मार ही देवेगी ते इथे मैनूं बचाउण लई होर कौण आवेगा।

पुनि राजा इह भाति बखानो॥ मै त्रिय तोर चरित्र न जानो॥ अब जूतिन सौ मुझै न मारो॥ जौ चाहौ तौ आनि बिहारो॥२२॥ – फिर राजे ने इस तर्हां किहा के मैं तेरे चाल चलण नूं समझदा नहीं। हुण मैनूं आपणी जुती नाल ना मार। जे कुझ चाहुंदी हैं तां कोई होर रसता अपणा लै।

साह सुता जब यौ सुनि पाई॥ नैन सैन दै सखी हटाई॥ आपु गई राजा पहि धाइ॥ काम भोग कीना लपटाइ॥२३॥ – जद इसत्री ने इह गल सुणी तां उसने अखां नाल इस़ारा करके सखीआं नूं हटा दिता उह खुद राजे वल दौड़ के गई अते लपट के राजे नाल मिलाप कर लिआ।

पोसत भाग अफीम मिलाइ॥ आसन ता तर दियो बनाइ॥ चुंबन राइ अलिंगन लए॥ लिंग देत तिह भग मो भए॥२४॥ – उसने पोसत, भाग अते अफीम मिला के दिता अते नरम ते सुंदर आसन तिआर कर दिता ते राजे नूं चुंबन कीते अते अलिंगन कीता।मिलाप दे समें दोवें पूरी तर्हां उतेजित हो गए ते भोग कीता।

भग मो लिंग दियो राजा जब॥ रुचि उपजी तरनी के जिय तब॥ लपटि लपटि आसन तर गई॥ चुंबन करत भूप के भई॥२५॥ – जदो राजा ने भग विच लिंग सिता, तद तरनी विच रुची जाग पई। उह राजे नूं लपट लपट के आसन ते पै गई। राजे नूं चुंमण लग पई।

गहि गहि तिह को गरे लगावा॥ आसन सौ आसनहि छुहावा॥ अधरन सौ दोऊ अधर लगाई॥ दुहूं कुचन सौ कुचन मिलाई॥२६॥ – किसे नूं हथां नाल फड़ के गल ला लिआ, इक-दूजे नूं आलिंगन कीता, होठां नाल होठ लगाए, अते छातीआं नाल छातीआं मिलाई।

इह बिधि भोग किया राजा तन॥ जिह बिधि रुचा चंचला के मन॥ बहुरौ राव बिदा करि दियो॥ अनत देस को मारग लियो॥२७॥ – राजा ने आपणे सरीर नूं उसे तरीके नाल वरतिआ जिवें चंचल (असथिर) मन वालीआं रमणीआं नूं पसंद है। फिर राजा ने इस रंग-मजे नूं छड दिता अते होर देस़ वल रवाना हो गिआ।

रति करि राव बिदा करि दिया॥ ऐसा चरित चंचला किया॥ अवर पुरख सौ राव न भाखा॥ जो त्रिय किय सो जिय मो राखा॥२८॥ – रात नूं मेरे नाल मिलाप करके, तुरदी वख्हरी हो गई। चंचल सुभा वाली इसतरी ने इतना ही आचरन कीता। उस ने किसे होर पुरख नाल मिलाप नहीं कीता। जो कुझ इसतरी ने कीता उह दिल विच रखिआ।

दोहरा॥ कितक दिनन न्रिप चंचला पुनि वहु लई बुलाइ॥ रानी करि राखी सदन सका न को छल पाइ॥२९॥ – राणी चंचला ने कुझ दिनां बाअद राजे नूं वापस बुलवाइआ, राजे नूं घर विच रख लिआ अते किसे वी दोख जां चलाकी नूं जाणन नहीं दिता।

इति स्री चरित्र पख्याने त्रिया चरित्रे मंत्री भूप संबादे चार सौ दोइ चरित्र समापतम सतु सुभम सतु॥४०२॥७१२३॥ – चरित्र पख्यान (चरित्रोपखिआन) विच त्रिया चरित्रे (सतरी चरित्र) दे मंत्री ते राजे दी गलबात विच ࠕࡁ࠲ ४०२ चरित्र खतम हो गए।

इस चरित्र दा नैतिक सार

इह चरितर साधारण नहीं है। इस विच इक पासे राजे दा धरमी होणा दरसाइआ गिआ है। पर नारी दी सेज ते ना जाण वाला दिखाइआ है ते दूजे पासे नारी वलों जोर जबर नाल, कुट मार कर के बलातकार हुंदा वी दिखाइआ है। इह सचाई है के वडे वडे राजे, सूरबीर जोधे वी कई वार त्रीआ चरितर विच फस जांदे हन। इह मंनिआ जांदा है के काम वास़ना कारण ज़ोर जबर केवल पुरख करदा है पर इतिहास विच कई उदाहरण हन जिहनां विच इसत्री ने वी इह ज़ोर ज़बरदसती कीती होवे। किसे तों कुट खा के वी उस नाल भोग करना ते फेर दुबारा उस कोल जाण नाल उस राजे दे अंदर लुकी होई कमी उजागर हुंदी है। इह किरदार विच आतम सनमान दी घाट नूं दरसाउंदा है।

चरितर बणदा है गुणां दे नाल। गुण हासल हुंदे हन मनुख दे हालात, उसदी संगत, उसदे निजी तजरबिआं नाल, उसदे गिआन नाल।

गुणां दी मति है गुरमति। गुणां दे गिआन नाल चरितर सवारिआ जांदा है। जिवें गुरबाणी आखदी है के "बिनु देखे उपजै नही आसा ॥ जदों अगिआनता हो जावे आस जाग जावे उसनूं काबू करन दा मारग है गिआन। चरितर दुआरा पातिस़ाह ने सपस़ट कीता है, समझाइआ है के वेखो भाई इह सब तुहाडे नाल वी हो सकदा है। धिआन रहे। बच के रहो।

आपणा चरितर देखण लई कोई स़ीस़ा नहीं हुंदा। तुसीं की करदे हों किवें सोचदे हों जदों कोई देख नहीं रहिआ हुंदा उस नाल तुहाडा चरितर पता लगदा है। तुहाडे अंदर की है, तुसीं गल कितनी सपस़ट करदेवहों, झूठ तां नहीं बोलदे, प्रधानगी दी, मस़हूर होण दी कितनी लालसा है इस नाल वी तुहाडा चरितर पता लगदा है। इमानदारी, निरपखदा, किरदार ते चरितर दी नींह हुंदी है। आचरण केवल बाहरी दिखावा हुंदा है सोझी तुहाडी काइआ दा प्रतिबिंब।


Source: ਚਰਿਤ੍ਰੋਪਖ੍ਯਾਨ ਚਰਿਤ੍ਰ ਚਾਰ ਸੌ ਦੋਇ (੪੦੨) – Charitropakhyan charitra 402