
Source: ਚਰਿਤ੍ਰੋਪਖ੍ਯਾਨ ਚਰਿਤ੍ਰ ਤੀਨ ਸੌ ਪਚੀਸ (੩੨੫) – Charitropakhyan charitra 325
चरित्र तीन सौ पचीस – कथा काम वासना विच लिपत राजकुमारी जो धोखे नाल आपणे पती नूं मार के आपणे प्रेमी नूं लोकां मुहरे ἦ (गुरू गोबिंद सिंघ जी॥ चरित्रोपख्यान ॥ स्री दसम ग्रंथ साहिब जी महाराज)
आदि बाणी विच गुणां दे गिआन राहीं अवगुणां नूं खतम कर किरदार विच चंगे बदलाव दी गल कीती गई है। अगिआनता दूर कर मनुखी गुणां दी सोझी दिती गई है। फेर वी मनुख आपणे मन ते विकारआ ते काबू पाउण विच चूक जांदा है। दसम बाणी विच चरितरां दे वखिआन राही दसम पातिस़ाह ने समाज विच हो रहे गलत कंमां दे उदाहरण दिते हन। दसिआ है के किहो जिहे किरदार साडे समाज विच मिलदे हन ते उहनां दा साडे समाज ते की असर हुंदा है। किवें उह आपणे विकारां कारन दूजिआं नूं धोखा दिंदे हन अते आपणा ते दूजिआं दा नुकसान करदे हन। इह समाज विच प्रचलित कथां कहाणीआं दा संग्रहि है जिसनूं पड़्ह के विकारां दी खेड सपस़ट हुंदी है। आओ वेखदे हां इस चरितर विच की सिखिआ है।
अफजूं॥ चौपई॥ स्री सुलतान सैन इक राजा॥ जा सम दुतिय न बिधना साजा॥ स्री सुलतान देइ तिह नारी॥ रूपवान गुनवान उजियारी॥१॥ – इक राजा सी जिसदा नाम स्री सुलतान सैन सी। उस वरगा दूजा कोई नहीं सी। उस स्री सुलतान नूं इक सुंदर, चंगीआं खूबीआं वाली ते सोहणी राणी मिली सी।
ता के भवन भई इक बाला॥ जानुक सिथर अगनि की ज्वाला॥ स्री सुलतान कुअरि उजियारी॥ कनक अवटि साचे जन ढारी॥२॥ – उहनां दे घर परमेसर किरपा नाल इक बहुत सुंदर बेटी जनमी जिसदी खूबसूरती जवाला वांग सी।
जोबनंग ता के जब भयो॥ बालापन तब ही सभ गयो॥ अंग अंग दयो अनंग दमामा॥ जाहिर भई जगत महि बामा॥३॥ – जदों उस राजकुमारी दे जोबन आइआ, उसदा बचपन चलिआ गिआ फिर उसदे सरीर विच काम दी तीवर इछा उतपंन हो गई। दुनीआं विच उसदी सुंदरता दी सोभा वी जाहिर हो गई।
सुनि सुनि प्रभा कुअर तह आवै॥ द्वारै भीर बार नहि पावै॥ एक तरुन तरुनी कौ भायो॥ जानुक मदन रूप धरि आयो॥४॥ – सुण सुण के कुवर (युवराज) उथे आउंदे हन। ‘द्वारै भीर बार नहि पावै’ – दरवाजे ते भीड़ है, पर कोई उसनूं प्रभावित नहीं कर पाउंदा। ‘एक तरुन तरुनी कौ भायो’ – इक नौजवान उसनूं भा गिआ। ‘जानुक मदन रूप धरि आयो’ – उस नूं लगिआ के प्रेम दा देवता (कामदेव) दा रूप धार के आइआ है।
सोइ कुअर तरुनी कौ भायो॥ पठै सहचरी बोलि पठायो॥ क्रीड़ा करी बहुत बिधि वा सो॥ कीनो प्रात सुयंबर ता सो॥५॥ – उह कंवारी कुड़ी उस नौजवान नूं पसंद करदी सी। उस ने आपणी सहेली राहीं सुनेहा भेजिआ। दोहां ने वख वख ढंग नाल रल मिल के काम दी खेडां खेडीआं। फेर सुयंबर दुआरा राजकुमारी ने उस मुंडे नाल ही विआह कर लिआ।
जब ही ब्याह तवन सौ कीयो॥ बहुतिक बरिस न जाने दीयो॥ क्रीड़ा करै भाति भातिन तन॥ हरख बढाइ बढाइ अधिक मन॥६॥
– जदों विआह कर लिआ, तां उहनां बहुता इंतज़ार नहीं कीता। वख-वख तरीकिआं नाल काम दी खेड खेडदे रहे ते मन विच खुस़ीआं नूं वधाउंदा रहे।
भोग बहुत दिन ता संग कयो॥ ता को बल सभ ही हरि लयो॥ जबै न्रिधात कुअर वह भयो॥ तब ही डारि ह्रिदै ते दयो॥७॥ – बहुत दिन तक लगातार ते बहुत जिआदा भोग करदे रहे। जिआदा भोग कारण मुंडे दी सरीरक ताकत प्रभू ने उस तों खोह लई। जदों उसदी सरीरक ताकत घट गई तां राजकुमारी ने उसनूं आपणे दिल तों तिआग दिता।
औरन साथ करै तब प्रीता॥ निसु दिन करै काम की रीता॥ पतिहि तोरि खोजा करि डारा॥ आपु अवर सो केल मचारा॥८॥ – राजकुमारी जे भोग लई गैर मरद नाल रिस़ता बणा लिआ। दिन-रात उह उस दे नाल काम दी रीत अदा करदी है। पती नूं तिआग के, उह गैर मरद नाल काम दी खेडां मचाउंदी रहिंदी है।
बिरह राइ ता को थो यारा॥ जा सो बधियो कुअरि के प्यारा॥ ता पर रही होइ सो लटकन॥ तिह हित मरत प्यास अरु भूखन॥९॥ – ‘बिरह (विछोड़ा) कारण उस ने गैर मरद नाल प्रेम दी रसी बंन लई। जिस ‘ते इह रसा पैंदा है, उह उस विच इतना लटकदा है कि उस नूं भुख ते पिआस वी नहीं रहिंदी।’
इक दिन भाग मित्र तिह लई॥ पोसत सहित अफीम चड़ई॥ बहु रति करी न बीरज गिराई॥ आठ पहिर लगि कुअरि बजाई॥१०॥ – गैर मरद वी आपणे मितर तों भंग लै आइआ। पोसत नाल रला के अफीम चड़ा लई। उस ने बहुत वार संग कीता पर वीरज नहीं डिगिआ। सारी रात राजकुमारी नाल संभोग कीता।”
सभ निसि नारि भोग जब पायो॥ बहु आसन करि हरख बढायो॥ ता पर तरुनि चित ते अटकी॥ भूलि गई सभ ही सुधि घट की॥११॥ – जदों सारी रात इसत्री दा भोग प्रापत होइआ, तद बहुत प्रकार दे आसन ला के खुश होइआ। उस वेले मन युवती उते अटक गिआ। आपणे घर दी सुध भुल गिआ।
द्वै घटिका जो भोग करत नर॥ ता पर रीझत नारि बहुत करि॥ चारि पहर जो केल कमावै॥ सो क्योन न त्रिय कौ चित चुरावै॥१२॥ – जदों उह मरद दो घड़ीआं इस तर्हां भोग राजकुमारी नाल करदा है, उस ‘ते उह बहुत रीझ जांदी है। जो चार पहर काम विच ग्रसत रहिआ, उह उस दा मन मोह लैंदा है।
रैनि सकल तिन तरुनि बजाई॥ भाति भाति के साथ हंढाई॥ आसन करे तरुनि बहु बारा॥ चुंबनादि नख घात अपारा॥१३॥ – रात दौरान वख-वख तरीकिआं नाल भोग करदे रहे। भिंन भिंन आसन करदे रहे। चुंबन ते नखां नाल इक दूजे ते घात करदे रहे।
भाति भाति के चतुरासन करि॥ भज्यो ताहि तर दाबि भुजन भरि॥ चुंबन आसन करत बिचछन॥ कोक कला कोबिद सभ लछन॥१४॥ – वख-वख किसम दे चतुर आसन बणा के, उस नूं आलिंगन करके, चुंबन दे आसन करके, पिआर अते दांत नाल कटके, होर वाधू कळावां नूं विहार करदे रहे।
दोहरा॥ पोसत स्राब अफीम बहु घोटि चड़ावत भंग॥ चारि पहर भामहि भजा तऊ न मुचा अनंग॥१५॥ – पोसत, स्राब (शराब), अफीम अते भंग वरगीआं नशीली चीज़ां बहुत मातरा विच पी के चौवी घंटे आपणे मन विच काम वासना दी लहिर चलाई रखी, तां वी उहनां दी काम वासना (मन दी त्रिस़ना) नहीं मुकदी सी।
चौपई॥ भोग करत सभ रैनि बितावत॥ दलिमलि सेज मिलिन ह्वै जावत॥ होत दिवाकर की अनुराई॥ छैल सेज मिलि बहुरि बिछाई॥१६॥ – उह रात भर भोग विअतीत करदे सी। हुण राजकुमारी पूरी तरां गैर मरद दी दिवानी सी।
पौढि प्रजंक अंक भरि सोऊ॥ भाग अफीम पियत मिलि दोऊ॥ बहुरि काम की केल मचावै॥ कोक सार मत प्रगट दिखावै॥१७॥ कैफन साथ रस मसे ह्वै करि॥ प्रोढि प्रजंक रहत दोऊ स्वै करि॥ बहुरि जगै रस रीति मचावै॥ कवित उचारहि धुरपद गावै॥१८॥ – फेर उह काम (जिसमानी संबंध) दी खेड करदे रहे। ‘कोक सार मत प्रगट दिखावै’ – इस विच ‘कोक’ (काम शासतर) दी करम-विधी करदे रहे।
तब लगि बिरह नटा ता को पति॥ निकसियो आइ तहा मूरख मति॥ तब त्रिय चतुर चरित्र बिचरि कै॥ हन्यो ताहि फासी गर डरि कै॥१९॥ – राजकुमारी दा पती वी बिरहा दी अगन विच उसनूं मिलण आइआ। उह मूरख नहीं जाणदा सी के उसदी पतनी (राजकुमारी) कितनी चतुर है ते की कर रही है। राजकुमारी ने उसनूं धोखे नाल गले विच फाहा पा के मार दिता।
एक कोठरी मित्र छपायो॥ पतिहि मारि सुर ऊच उघायो॥ राजा प्रजा सबद सुनि धाए॥ दुहिता के मंदरि चलि आए॥२०॥ – इक कोठरी विच आपणे मित्र गैर मरद नूं लुको दिता। उसने आपणे पती दे मरन दा रौला पा दिता। राजा ते प्रजा इह गल सुण के दौड़े आए। धी दे घर विच आ गए।
म्रितक परियो ता कौ भरतारा॥ राव रंक सभहूंन निहारा॥ पूछत भयो तिसी कह राजन॥ कहा भई या की गति कामनि॥२१॥
– वेखिआ के उसदा पती मरिआ होइआ है। राजे ने उसतों पुछिआ कि हुण इसदे इह हालत किवें होई।
सुनहु पिता मै कछू न जानो॥ रोग याहि जो तुमै बखानो॥ अकसमात्र या कह कछु भयो॥ जीवत हुतो म्रितक ह्वै गयो॥२२॥ – राजकुमारी आखदी सुणो पिता जी, मैनूं कुझ नहीं पता। उह तां अचानक ही मर गिआ, जो रोग तुसीं बखिआन कर रहे हों उह तां अकसमात ही आ गिआ। इस करके इह अचानक ही मर गिआ।
अरु जौ अब मो मै कछु सत है॥ अरु जौ सत्य बेद कौ मत है॥ अब मै रुद्र तपस्या करि हौ॥ याहि जियाऊ कै जरि मरि हौ॥२३॥ – फेर आखदी के जे मेरे विच कुझ सच है अते जे वेदां दी मत सची है, तां हुण मैं रुद्र दी तपसिआ करांगी अते इस नूं फेर जिउंदा कर दिआंगी। (उसदे मन विच गहिरी चाल सी पर उह सती सावित्री होण दा नाटक कर रही सी)
तुमहूं बैठ याहि अंगना अब॥ पूजा करहु सदा सिव की सब॥ मै या कौ इह घर लै जै है॥ पूजि सदा सिव बहुरि जिवै हौ॥२४॥
– तुसीं हुण इस अंगणे विच ही बैठो, शिव जी दी पूजा करो। मैं इसनूं घर लै जांदी हां, जे सीं सारे सदा शिव दी पूजा करोगे तां इह मुड़ जिऊंदा हो जावेगा।
मात पिता अंगना बैठाए॥ नैबी महता सगल बुलाए॥ लै संग गई म्रितक कह तिह घर॥ राखियो थो जहा जार छपा करि॥२५॥ – राजकुमारी ने मां-पिउ ने अंगणे विच बिठाइआ, महता (रिस़तेदार) ते होर सारे बुलाए; फिर मरन वाले नूं आपणे घर लै गई जिथे पहिलां उसने आपणे मितर (गैर मरद) नूं लुको के रखिआ सी।
द्रिड़ दै करि॥ रमी जार के साथ बिहसि करि॥ न्रिप जुत बैठ लोग द्वारा परि॥ भेद अभेद न सकत बिचरि करि॥२६॥
– उस घर जा के पका दरवाजा बंद कर लिआ जिथे बाहर सारे लोग बैठे सी। राजा बैठ के लोकां नाल गल करदा रहिआ पर उसनूं अंदर की चलदा है भेद नहीं सी पता।
ते सभ ही जिय मै अस जानै॥ सुता सिवहि पूजत अनुमानै॥ या की आजु सतता लहि है॥ भली बुरी बतिया तब कहि है॥२७॥ – हरेक मनुख आपणे आप नूं सभ तों गिआनी समझदा है, कोई स़िव नूं मंन के पूजदा है। कोई चंगी कोई मंदी गल कर रहिआ सी।
जो यह कुअरि रुद्र सो रत है॥ जौ यह तिह चरनन मै मत है॥ तौ पति जीवत बार न लगि है॥ सिव सिव भाखि म्रितक पुनि जगि है॥२८॥ – लोकां दा कहिणा सी के जे इह राजकुमारी रुद्र (स़िव) नाल प्रेम करदी है अते उसदे चरनां विच मन ला चुकी है, तां इसदी इज़त कदे नास नहीं होणी; "सिव सिव जप के मरन तों बाअद वी दुबारा जीवंत कर सकदी है।
इत ते द्वार बिचार बिचारत॥ उत त्रिय संग भी जार महा रत॥ ज्यों ज्यों लपटि चोट चटकावै॥ ते जाने वह गाल्रह बजावै॥२९॥ – उथे उह दरवाज़े Ἑते खड़ा सोचदा रहिंदा है, ते इथे उह राजकुमारी किसे होर नाल काम-रस विच डुबी हुंदी है। जिवेंἑजिवें उह उस नाल लपटदी ते चटकां मारदी है, उह समझदे हन कि इह गलां आपणे पती ही नाम Ἑते कर रही है।
तहा खोदि भू ता को गाडा॥ बाहर हाड गोड नहि छाडा॥ अपने साथ जार कह धरि कै॥ लै आई इह भाति उचरि कै॥३०॥ – उसने ओथे ही ज़मीन खोद के आपणे मरे होए पती नूं गड दिता, बाहर उसदे हडἑगोड वी नहीं छडे। आपणे साथी गैर मरद नूं फड़ के बाहर लिआउंदी है ते कहिंदी है "मैं इसनूं इस तर्हां जिउंदा कर के लिआई हां।
जब मै ध्यान रुद्र को धरियो॥ तब सिव अस मुर साथ उचरियो॥ बरंब्रूह पुत्री मन भावत॥ जो इह समै ह्रिदै महि आवत॥३१॥ – जदों मैं रुद्र (स़िव) दा धिआन धरिआ, तदों स़िव ने आप मेनूं कहिआ "हे ब्रहमा दी पुतरी, जो इस वेले तेरे हिरदे विच आ रिहा है, उही तैनूं पिआरा लगदा है।। इहनां गलां नाल उह आपणे पिता राजे नूं ब्रहमा कहि चापलूसी कर रही सी।
तब मै कहियो जियाइ देहु पति॥ जो तुमरे चरनन महि मुर मति॥ तब इह भाति बखानियो सिव बच॥ सो तुम समझि लेहु भूपति सचु॥३२॥ – मैं स़िव नूं किहा "मैनूं मेरा पती जीउंदा दे दिओ, किउंकि मेरा मन तुहाडे चरनां विच टिकिआ है। तद स़िव ने जो इह बचन कहे, उही मैं हुण तुहानूं सचἑसच सुणा रही हां, हे राजन।
दोहरा॥ ता ते अति सुंदर करो वा ते बैस किसोर॥ नाथ जीयो स्री संभु की क्रिपा द्रिसटि की कोर॥३३॥ – इस करके उह बहुत ही सुंदर हो गिआ, नवां रूप होर वी मनमोहक लगण लगा; हे नाथ, इह सभ स़्री संभू (स़िव) दी किरपा भरी निगाह दा प्रभाव है।
चौपई॥ सभहिन बचन सत करि जाना॥ सिव को सत बचन अनुमाना॥ तब ते तजि सुंदर जिय त्रासा॥ नित प्रति ता सौ करत बिलासा॥३४॥ – सभ ने उसदी गल नूं सच मंन लिआ अते स़िव दे बचन वी सच ही समझे। उस दिन तों आपणे मितर नाल ही रसἑविलास करन लग पई रहिण लग पई।
इति स्री चरित्र पख्याने त्रिया चरित्रे मंत्री भूप संबादे तीन सौ पचीस चरित्र समापतम सतु सुभम सतु॥३२५॥६१४२॥ – इस तर्हां ३२५ त्रिया चरित्र (त्रीआ चरित्र) समापत हुंदा है।
इस चरित्र दा नैतिक सार
इस चरितर विच काम वासना दी अग किसे मनुख (इसतरी जां पुरख) नूं किस हद तक किरदार दे पधर तक गिरा सकती है इह दसिआ जा रहिआ है। राजकुमारी ने आपणे पती नूं धोखा दिता, गैर मरद नाल भोग किता, पती दी जान लई, राजे नूं झूठ बोलिआ, चापलूसी कीती। लोकां दे विस़वास उहनां दी परमेसर वल भावना दा फाइदा चकिआ। इस चरितर नाल इह वी पता लगदा है के काम नस़े वांग है। जिवें जिवें भांग, पोसत, अफ़ीम, स़राब दा नस़ा वध जांदा है उसे तरां काम दा नस़ा वी इनसान दी काइआ नूं खतम करदा है। समाज विच इहो जिहे चरितर वाले मनुख वी हन जो काम दे नस़े विच आपणे पती जां पतनी दी जान लै लैंदे हन। इह सिखिआ है के जदों काम इतना जिआदा प्रबल हो जावे तां उह चिंता दा विस़ा है। नस़ा माड़ा है। इस नाल मनुख दे किरदार ते गहिरा असर हुंदा है। नाल ही इह भावना ते सवाल है। मर के कोई जीवत नहीं हुंदा, समाज नूं भावना विच बह के इह नहीं भुलणा चाहीदा। अज वी इस भावना दे चलदे कई लोक मूरख बणदे हन। खबरां विच वेखदे हां के लोक मरिआं नूं जीउंदा करन लई बली तक दिंदे हन। गिआन सुरत दीआं अखां खोलदा है।
चरितर बणदा है गुणां दे नाल। गुण हासल हुंदे हन मनुख दे हालात, उसदी संगत, उसदे निजी तजरबिआं नाल, उसदे गिआन नाल।
गुणां दी मति है गुरमति। गुणां दे गिआन नाल चरितर सवारिआ जांदा है। जिवें गुरबाणी आखदी है के "बिनु देखे उपजै नही आसा ॥ जदों अगिआनता हो जावे आस जाग जावे उसनूं काबू करन दा मारग है गिआन। चरितर दुआरा पातिस़ाह ने सपस़ट कीता है, समझाइआ है के वेखो भाई इह सब तुहाडे नाल वी हो सकदा है। धिआन रहे। बच के रहो।
आपणा चरितर देखण लई कोई स़ीस़ा नहीं हुंदा। तुसीं की करदे हों किवें सोचदे हों जदों कोई देख नहीं रहिआ हुंदा उस नाल तुहाडा चरितर पता लगदा है। तुहाडे अंदर की है, तुसीं गल कितनी सपस़ट करदेवहों, झूठ तां नहीं बोलदे, प्रधानगी दी, मस़हूर होण दी कितनी लालसा है इस नाल वी तुहाडा चरितर पता लगदा है। इमानदारी, निरपखदा, किरदार ते चरितर दी नींह हुंदी है। आचरण केवल बाहरी दिखावा हुंदा है सोझी तुहाडी काइआ दा प्रतिबिंब।

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