
Source: ਚਰਿਤ੍ਰੋਪਖ੍ਯਾਨ ਖੋੜਸਮੋ/ ਸੋਲਾਂ (੧੬) – Charitropakhyan charitra ੧੬
चरितर खोड़समो (१६) ἓ कथा सिआणे चंगे किरदार वाले राजे दी जो सतलुज दे कंडे रहिंदा सी ते त्रीआ चरितर दी जिसने आपणे घरे राजे नूं धोखे नाल बुलाइआ। इह किरदार है के राजा किवें चालाकी नाल बच के निकलदा है। चरित्रोपख्यान ॥ स्री दसम ग्रंथ साहिब जी
दोहरा॥ तीर सतुद्रव के हुतो रहत राइ सुख पाइ॥ दरब हेत तिह ठौर ही रामजनी इक आइ॥१॥ – सतलुज दरीआ दे लागे इक राजा सुख नाल रहिंदा सी।
अड़िल॥ छजिया जा को नाम सकल जग जानई॥ लधीआ वा की नाम हितू पहिचानई॥ जो कोऊ पुरख बिलोकत तिन को आइ कै॥ हो मन बच क्रम करि रहित ह्रिदै सुखु पाइ कै॥२॥ – उसदा नाम सारे जगत विच छाइआ सी उसदी नेकी ते उसदे गुणां कारण। जो वी मनुख उसदे कोल आ के उसनूं मिलदा है, उह मन, बचन अते करम नाल साफ़ रहि के दिल विच सुख पा लैंदा सी। राजा अपणे किरदार लई जाणिआ जांदा सी।
दोहरा॥ निरखि राइ सौ बसि भई तिस बसि होत न सोइ॥ तिन चित मै चिंता करी किह बिधि मिलबौ होइ॥३॥ यह मो पर रीझत नही कहु कस करो उपाइ॥ मोरे सदन न आवई मुहि नहि लेत बुलाइ॥४॥ – राजे नूं वेख के इक इसत्री दा मन राजे ते आ गिआ। उह उसदे मोह विच फस गई, पर राजा उसदे वस विच नहीं आउण वाला सी। उसने आपणे मन विच सोचिआ कि हुण मैं किस तरीके नाल राजे नूं आपणे वस विच करां। उसने सोचिआ इह मेरे उते मोहित नहीं हुंदा, मैं की उपाइ करां।
तुरतु तवन को कीजियै किह बिधि मिलन उपाइ॥ जंत्र मंत्र चेटक चरित्र कीए जु बसि ह्वै जाइ॥५॥ जंत्र मंत्र रही हारि करि राइ मिल्यो नहि आइ॥ एक चरित्र तब तिन कियो बसि करबे के भाइ॥६॥ – इसनूं तुरंत वस करन दा की उपाअ कीता जावे। उसनूं वस़ विच करन लई जंत्र मंत्र टोने अते चालाकीआं कीतीआं पर राजे दे चंगे किरदार कारण उह वस नहीं आइआ। फिर उसनूं वस़ विच करन दी नीअत नाल इक होर चाल चली गई।
बसत्र सभै भगवे करे धरि जुगिया को भेस॥ सभा मध्य तिह राइ कौ कीनो आनि अदेस॥७॥ अड़िल॥ तिह जुगियहि लखि राइ रीझि चित मै रहियो॥ जा ते कछु संग्रहौ मंत्र मन मो चहियो॥ तिह ग्रिहि दियो पठाइक दूत बुलाइ कै॥ हो कला सिखन के हेत मंत्र समझाइ कै॥८॥ – इसत्री सारे भगवे रंग दे कपड़े पा लए अते जोगी दा भेस बणा लिआ। सभा दे विच जा के राजे नूं आदेस़ दिता। उस जोगी नूं देख के राजा मनों मन प्रसंन हो गिआ। राजे नूं लगा जोगी बहुत पहुंचिआ होइआ है। राजे दे मन विच इछा होई कि इस तों कुझ गुर मंत्र सिख लिते जाण। राजे ने दूत भेज के उस जोगी नूं आपणे घर बुलाइआ ते कला सिखण दी इछा जाहिर कीती।
चौपई॥ चलि सेवक जुगिया पहि आवा॥ राइ कहियो सो ताहि जतावा॥ कछू मंत्र मुर ईसहि दीजै॥ क्रिपा जानि कारज प्रभु कीजै॥९॥ दोहरा॥ पहर एक लौ छोरि द्रिग कही जोग यहि बात॥ लै आवहु राजहि इहा जौ गुन सिख्यो चहात॥१०॥ अरध रात बीतै जबै आवै हमरे पास॥ स्री गोरख की मया ते जै है नही निरास॥११॥ – राजे दे हुकम अनुसार सेवक जोगी कोल गिआ अते उसनूं सारा संदेस़ समझाइआ। उसने जोगी अगे बेनती कीती कि मैनूं कोई मंत्र दिओ अते किरपा करके मेरा कंम सफल करो। जोगी ने समें लई आपणीआं अखां बंद कीतीआं ते कहिआ राजे नूं इथे लिआओ जे उह गुण सिखणा चाहुंदा है। फिर उसने किहा कि जदों अधी रात लंघ जावे तां राजा मेरे कोल आवे। तां स्री गोरखनाथ दी किरपा नाल उह निरास नहीं होवेगा, अरथात उसदी मनोरथ पूरी हो जावेगी।
चौपई॥ सेवक ता सो जाइ सुनायो॥ अरध रात्र बीते सु जगायो॥ ता जुगिया के ग्रिह लै आयो॥ हेरि राइ त्रिय अति सुख पायो॥१२॥ दोहरा॥ राजा सो आइसु कही दीजै लोग उठाहि॥ धूप दीप अछत पुहप आछो सुरा मंगाइ॥१३॥ तब राजै तैसो कीआ लोगन दिया उठाइ॥ धूप दीप अछत पुहप आछो सुरा मंगाइ॥१४॥ – सेवक ने जा के जो कुझ सुणिआ सी उह सभ राजे नूं दस दिता अते अधी रात लंघण उपरांत राजे नूं जगाइआ। फिर उह राजे नूं जोगी दे घर लै गिआ। जोगी नूं वेख के इसत्री नूं बहुत खुस़ी होई अते उसने मन ही मन सुख महिसूस कीता। इस तों बाअद राजे नूं आदेस़ दिता गिआ कि सभ लोकां नूं उठा के बाहर भेज दिता जावे अते धूप दीवे, अखत, फुल अते चंगी स़राब मंगवाई जावे। राजे ने बिलकुल उसे तर्हां कीता, लोकां नूं उठा के बाहर भेज दिता अते जो कुझ मंगिआ गिआ सी उह सभ मंगवा लिआ।
तब राजे अपने सभन लोगन दिया उठाइ॥ आपु इकेलो ही रहियो मंत्र हेत सुख पाइ॥१५॥ चौपई॥ रहियो इकेलो राइ निहारियो॥ तब जोगी इह भाति उचारियो॥ चमतकार इक तौहि दिखैहौ॥ तिह पाछै तुहि मंत्र सिखैहौ॥१६॥ दोहरा॥ होत पुरख ते मै त्रिया त्रिय ते नर ह्वै जाउ॥ नर ह्वै सिखवौ मंत्र तुहि त्रिय ह्वै भोग कमाउ॥१७॥ – राजे ने आपणे सारे लोकां नूं हटा दिता अते आप इकला रहि गिआ तां जो मंत्र सिख के मन दी इछा पूरी कर सके। जदों राजा इकला बैठा सी तां जोगी ने उसनूं किहा कि पहिलां मैं तैनूं इक अचंभा विखावांगा अते उस तों बाअद मंत्र सिखावांगा। फिर जोगी ने आपणी विदिआ दी स़कती बारे दसिआ कि उह रूप बदलण दी समरथा रखदा है अते इस तरीके नाल राजे नूं मंत्र सिखाउण अते उसदी इछा पूरी करन दी गल कीती, जिस नाल इह दरसाइआ जांदा है कि जोगी दा रूप धारण कीती इसत्री आपणी चालाकी अते माइआ नाल राजे नूं आपणे वस़ विच लैणा चाहुंदा सी।
राइ बाच॥ पुरख मंत्र दाइक पिता मंत्र दाइक त्रिय मात॥ तिन की सेवा कीजियै भोगन की न जात॥१८॥ अड़िल॥ बहु बरिसन लगि जानि सेव गुर कीजियै॥ जतन कोटि करि बहुरि सु मंत्रहि लीजियै॥ जाहि अरथ के हेत सीस निहुराइयै॥ हो कहो चतुरि ता सौ क्योन केल मचाइयै॥१९॥ चौपई॥ तब जोगी इह भाति सुनायो॥ तव भेटन हित भेख बनायो॥ अब मेरे संग भोग कमैयै॥ आन पिया सुभ सेज सुहैयै॥२०॥ – राजा कहिंदा है कि मंत्र देण वाला पुरख पिता दे समान हुंदा है अते मंत्र देण वाली इसतरी माता दे बराबर मंनी जांदी है, इस लई उहनां दी सेवा करनी चाहीदी है अते उन्हां नाल भोग दी भावना नहीं रखी जांदी। अगे इह विचार दिता गिआ है कि मंत्र प्रापत करन लई सालां तक गुरू दी सेवा करनी पैंदी है अते बहुत यतन करन तों बाअद ही इह विदिआ मिलदी है। जिस लाभ लई मनुख सिर निवांदा है, उस नाल चतुर मनुख नूं अणउचित करतूतां नहीं करनी चाहीदीआं। फिर जोगी कहिंदा है कि मैं तैनूं मिलण लई ही इह भेस बणाइआ सी, अरथात उसदा जोगी बणना इक योजना अते चाल दा हिसा सी। जोगी दे रूप धार के बैठी इसत्री ने कहिआ हुण तूं मेरे नाल भोग कर।
दोहरा॥ तन तरफत तव मिलन कौ बिरह बिकल भयो अंग॥ सेज सुहैयै आन पिय आजु रमो मुहि संग॥२१॥ भजे बधैहौ चोर कहि तजे दिवैहौ गारि॥ नातर संक बिसारि करि मो सौ करहु बिहार॥२२॥ कामातुर ह्वै जो तरुनि आवत पिय के पास॥ महा नरक सो डारियत दै जो जान निरास॥२३॥ तन अनंग जा के जगै ताहि न दै रति दान॥ तवन पुरख को डारियत जहा नरक की खानि॥२४॥ – इसत्री आपणी तीबर लालसा अते मन दी बेचैनी नूं दरसाउंदी है अते दूजे पासे दबाअ ते धमकी दे के आपणी गल मनवाउण दी कोस़िस़ करदी है। अगे पातस़ाह लिखदे हन कि जदों मनुख अंधी इछा दे वस़ विच आ जांदा है तां उह सही गलत दी पछाण भुल जांदा है अते होरनां नूं भटकाउण वाले रसते वल धकदा है। कावि विच इह वी समझाइआ गिआ है कि जो मनुख आपणी अंदरली अगनी नूं काबू नहीं करदा अते अनुचित राह चुणदा है उह आतमिक तौर ते पतन वल जांदा है। इह सारा वरणन इक चेतावनी दे रूप विच है कि बेलगाम कामना अते ज़बरदसती मनुख नूं नास वल लै जांदी है।
अड़िल॥ रामजनी ग्रिह जनम बिधातै मुहि दिया॥ तव मिलबे हित भेख जोग को मै लिया॥ तुरत सेज हमरी अब आनि सुहाइयै॥ हो ह्वै दासी तव रहों न मुहि तरसाइयै॥२५॥ दोहरा॥ कहा भयो सुघरे भए करत जुबन को मान॥ बिरह बान मो को लगे ब्रिथा न दीजै जान॥२६॥ अड़िल॥ ब्रिथा न दीजै जान मैन बसि मै भई॥ बिरहि समुंद के बीच बूडि सिर लौ गई॥ भोग करे बिनु मोहि जान नही दीजियै॥ हो घनवारी निस हेरि गुमान न कीजियै॥२७॥ – इसतरी आपणे दुख भरे जीवन अते किसमत नूं दोस़ दे के कहिंदी है कि उसने मिलाप लई जोगी दा भेस धारन कीता। उह राजे नूं तुरंत आपणे कोल आउण लई कहिंदी है अते आपणे आप नूं पूरी तर्हां अधीन करन दी गल करदी है। इसत्री उसनूं आपणी जवानी उते माण ना करन दी सलाह दिंदी है अते कहिंदी है कि विछोड़े दी पीड़ ने उसनूं अंदरों तोड़ दिता है। फिर उह कहिंदी है कि कामना अते बेचैनी दे वस़ विच आ के उसदी हालत डुबदे मनुख वरगी हो गई है। इह सभ बिआन मनुखी कमज़ोरीआं अते बेकाबू इछावां दे नुकसान नूं दरसाउंदे हन।
दिसन दिसन के लोग तिहारे आवही॥ मन बाछत जो बात उहै बर पावही॥ कवन अवग्रया मोरि न तुम कह पाइयै॥ हो दासन दासी ह्वै हौ सेज सुहाइयै॥२८॥ मंत्र सिखन हित धाम तिहारे आइयो॥ तुम आगै ऐसे इह चरित बनाइयो॥ मै न तुहारे संग भोग क्योहूं करो॥ हो धरम छूटन के हेत अधिक मन मै डरो॥२९॥ रामजनी बहु चरित्र बनाए॥ हाइ भाइ बहु भाति दिखाए॥ जंत्र मंत्र तंत्रो अति करे॥ कैसे हूं राइ न कर मै धरे॥३०॥ – इसत्री राजे नूं कहिंदी है कि हर पासे तों लोक तेरे कोल आउंदे हन अते जो मन चाहुंदी गल मंगदे हन उह पा लैंदे हन, फिर मेरी किहड़ी बेअदबी है जो तूं पूरी नहीं कर सकदा। उह आपणे आप नूं पूरी तर्हां अधीन दस के कहिंदी है कि मैं दासी बण के तेरे नाल रहिण लई तिआर हां। इस दे उतर विच राजा सपस़ट करदा है कि उह मंत्र सिखण दे उदेस़ नाल जोगी दे घर आइआ सी अते तूं उसदे साहमणे इहो जिही चाल चली। उह कहिंदा है कि मैं किसे वी हालत विच तेरे नाल अनुचित करम नहीं करांगा किउंकि इस नाल धरम तों डिगण दा डर है। आख़र विच कथा दसदी है कि उस इसतरी ने बहुत तर्हां दीआं चालां, नाटक अते जंत्र मंत्र आज़माए पर किसे वी तरीके नाल राजे नूं आपणे वस़ विच नहीं कर सकी।
अड़िल॥ चोर चोर कहि उठी सु आंगन जाइ कै॥ त्रास दिखायो ताहि मिलन हित राइ कै॥ बहुरि कही त्रिय आइ बात सुन लीजियै॥ हो अबै बधैहौ तोहि कि मोहि भजीजियै॥३१॥ चोर बचन सुनि लोग पहुंचे आइ कै॥ तिन प्रति कहियो कि सोत उठी बरराइ कै॥ गए धाम ते कहियो मित्र कौ कर पकरि॥ हो अबै बधैहौ तोहि कि मो सौ भोग करि॥३२॥ – फेर उह इसतरी अचानक आंगन विच जा के चोर चोर दा स़ोर मचाउंदी है तां जो लोक इकठे हो जाण अते राजा डर दे मारे उसदे नाल गलत करम रकदा होइआ दिसे। उसदा मकसद मिलाप लई डर अते दबाअ पैदा करना सी। फिर उह राजे नूं धमकी दे के कहिंदी है कि जां तां मेरी गल मंनो नहीं तां मैं तैनूं लोकां विच बदनाम करांगी। इह सुण के लोक दौड़ के आउणगे। उस उते झूठा दोस़ लगा के डराउंदी है। इस सारे प्रसंग राहीं इह दिखाइआ गिआ है कि किवें झूठ, धोखे अते धमकीआं नाल किसे निरदोस़ नूं फसाउण दी कोस़िस़ कीती जांदी है अते इह कथा मनुख नूं ऐसीआं चालां तों सावधान रहिण दी सिखिआ दिंदी है।
दोहरा॥ तबै राइ चित के बिखै ऐसे किया बिचार॥ चरित खेलि कछु निकसियै इहे मंत्र का सार॥३३॥ भजौ तौ इजत जात है भोग कियो ध्रम जाइ॥ कठिन बनी दुहूं बात तिह करता करै सहाइ॥३४॥ पूत होइ तौ भाड वह सुता तौ बेस्रया होइ॥ भोग करे भाजत धरम भजे बंधावत सोइ॥३५॥ -राजा आपणे मन विच गहिरा विचार करदा है कि इस सारी चालाकी अते नाटक तों किसे तरीके नाल आपणे आप नूं बचाइआ जावे, किउंकि इही मंत्र दी असली समझ है। उह सोचदा है कि जे भजदा है तां इज़त खतम हो जांदी है अते जे गलत करम कर लैंदा है तां धरम नस़ट हो जांदा है, इस लई दोवें राह बहुत कठिन हन अते हुण केवल परमेसर ही सहाइता कर सकदा है। अगे उह समाजक डर अते बदनामी दा ख़िआल करदा है कि जे इह गल खुल गई तां पुतर होवे तां उसनूं भांड किहा जावेगा अते धी होवे तां उसदी इज़त उते दाग लगेगा। इस लई उह निस़चे करदा है कि ना तां भोग करना ठीक है किउंकि इस नाल धरम नास हुंदा है अते ना ही भजणा ठीक है किउंकि इस नाल बंन्हे जाण अते बदनामी दा डर है। इह सारा वरणन राजे दी अंदरूनी दिली दिलेमा अते धरमिक सोच नूं दरसाउंदा है।
चौपई॥ कहियो सुनहु तुम बात पिआरी॥ देखत थो मै प्रीति तिहारी॥ तुम सी त्रिया हाथ जो परै॥ बडो मूड़ जो ताहि प्रहरै॥३६॥ दोहरा॥ रूपवंत तो सी त्रिया परै जु कर मै आइ॥ ताहि त्याग मन मै करै ता को जनम लजाइ॥३७॥ पोसत भाग अफीम बहुत लीजै तुरत मंगाइ॥ निजु कर मोहि पिवाइयै ह्रिदै हरख उपजाइ॥३८॥ तुम मदरा पीवहु घनो हमै पिवावहु भंग॥ चारि पहर कौ मानिहौ भोगि तिहारे संग॥३९॥ चौपई॥ फूलि गई सुन बात अयानी॥ भेद अभेद की बात न जानी॥ अधिक ह्रिदे मै सुख उपजायो॥ अमल कहियो सो तुरत मंगायो॥४०॥ – फेर राजा मिठीआं गलां कर के उस इसत्री दी प्रस़ंसा करदा है अते कहिंदा है कि मैं तेरी प्रीत नूं समझदा हां अते ऐसा मौका मिलण ते जो मनुख इसनूं ठुकराए उह मूरख हुंदा है। उह इह वी दसदा है कि जे कोई सुंदर अते आकरस़क मौका मिले ते उसनूं तिआग दिता जावे तां जीवन विअरथ जांदा है। फिर चालाकी नाल नस़े दी गल करके मन नूं खुस़ करन अते होस़ घटाउण दी योजना बणाई जांदी है तां जो रात भर मनमरज़ी नाल समां बिताइआ जा सके। राजा कहिंदा है के तूं मदिरा पी ते मैं भांग पी लैंदा हां जिस नाल भोग सारी रात कीता जा सके। इह गलां सुण के उह इसतरी खुस़ हो जांदी है अते भले बुरे दी समझ गुआ बैठदी है, उसदे मन विच वधेरे सुख दा भाव पैदा हुंदा है अते उह तुरंत उही चीज़ां मंगवा लैंदी है जो कहीआं गईआं सन। इह सारा प्रसंग धोखे, लालच अते अकल दी कमी नूं दरसाउंदा है।
दोहरा॥ पोसत भाग अफीम बहु गहिरी भाग घुटाइ॥ तुरत तरनि ल्यावत भई मद सत बार चुआइ॥४१॥ अड़िल॥ राइ तबै चित भीतर किया बिचार है॥ याहि न भजिहौ आजु मंत्र का सार है॥ अधिक मत करि याहि खाट पर डारि कै॥ हो साठि मुहर दै भजिहों धरम संभारि कै॥४२॥ – उस इसतरी ने पोसत, भंग अते अफीम आदि नस़ीलीआं चीज़ां चंगी तर्हां घुट के तिआर कर लईआं अते तुरंत मदिरा वी बहुत वारी छाण के लिआई तां जो साहमणे वाला पूरी तर्हां मते विच आ जावे। इस दरमिआन राजा आपणे मन विच सोचदा है कि अज भजणा ठीक नहीं किउंकि असल मंत्र दा भेद धीरज अते बुधी नाल निकलणा है। उह फैसला करदा है कि इसनूं बहुत नस़े विच कर के खाट "मंजी उते सुआ दिता जावे अते फिर कुझ धन दे के चुपचाप इथों निकल जावे, तां जो धरम दी रखिआ वी रहे अते इज़त वी बची रहे।
दोहरा॥ रीति न जानत प्रीत की पैसन की परतीत॥ बिछू बिसीअरु बेसया कहो कवन के मीत॥४३॥ ता को मद प्रयायो घनो अति चित मोद बढाइ॥ मत सवाई खाट पर आपि भजन के भाइ॥४४॥ मदरा प्रयायो तरुनि को निजु कर प्याले डारि॥ इह छल सौ तिह मत करि राखी खाट सुवारि॥४५॥ – पातिस़ाह आखदे हन के जो मनुख प्रीत दी रीत नहीं जाणदा अते केवल धन उते भरोसा करदा है, उह बिछू, सप जां वेसवा वरगिआं नूं वी आपणा मितर समझ बैठदा है, जो असल विच खतरनाक हुंदे हन। अगे दसिआ गिआ है कि उस इसतरी ने बहुत ज़िआदा नस़ा पी लिआ, जिस नाल उसदा मन खुस़ी नाल भर गिआ अते उह पूरी तर्हां नस़े विच आ के खाट/मंजी उते पै गई, जदकि दूजे पासे राजा भज जाण दी योजना बणाउंदा है। फिर इह वी किहा गिआ है कि इसतरी नूं आपणे हथीं मदिरा पिला के चालाकी नाल पूरी तर्हां नस़े विच कर दिता गिआ अते इस छल नाल उसनूं सुला दिता गिआ, तां जो राजा बिना धरम अते इज़त गवाए आपणे आप नूं बचा सके।
अड़िल॥ भरि भरि निजु कर प्याले मद तिह प्रयाइयो॥ रामजनी सौ अधिक सु नेह जताइयो॥ मत होइ स्वै गई राइ तब यौ कियो॥ हो साठि मुहर दै ताहि भजन को मगु लियो॥४६॥ जो तुम सौ हित करे न तुम तिह सौ करो॥ जो तुमरे रस ढरे न तिह रस तुम ढरो॥ जा के चित की बात आपु नहि पाइयै॥ हो ता कह चित को भेद न कबहु जताइयै॥४७॥ – राजा उस इसतरी नूं आपणे हथीं पिआले भर भर के मदिरा पिलांदा है अते पिआर दिखा के उसदा भरोसा होर वधा दिंदा है। जदों उह पूरी तर्हां नस़े विच हो के सौ जांदी है तां राजा आपणी योजना अनुसार उसनूं कुझ मुहरां दे के उथों चुपचाप निकल जांदा है। अगे नैतिक सिखिआ दिती गई है कि जो विअकती सचे मन नाल तुहाडा भला नहीं करदा, उस नाल तुहानूं वी अंदरों नहीं जुड़ना चाहीदा। जिसदे मन दे भाव तुहानूं समझ नहीं आउंदे, उसदे साहमणे आपणा मन दा भेद कदे वी प्रगट नहीं करना चाहीदा। इह सारा प्रसंग सावधानी, बुधीमानी अते आतम-संयम दी सिखिआ दिंदा है।
दोहरा॥ राइ भज्यो त्रिय मत करि साठि मुहर दै ताहि॥ आनि बिराज्रयो धाम मै किनहूं न हेरियो वाहि॥४८॥ अड़िल॥ तबै राइ ग्रिह आइ सु प्रण ऐसे कियो॥ भले जतन सौ राखि धरम अब मै लियो॥ देस देस निजु प्रभ की प्रभा बिखेरिहौ॥ हो आन त्रिया कह बहुरि न कबहूं हेरिहौ॥४९॥ दोहरा॥ वहै प्रतग्रया तदिन ते ब्यापत मो हिय माहि॥ ता दिन ते पर नारि कौ हेरत कबहूं नाहि॥५०॥ – राजा उस इसतरी नूं पूरी तर्हां नस़ा करा के कुझ मुहरां दे के चुपचाप उथों निकल जांदा है अते बिना किसे दे वेखे आपणे घर सुरखिअत पहुंच जांदा है। घर आ के उह आपणे मन विच द्रिड़ निस़चा करदा है कि उसने बहुत सोच समझ के धरम दी रखिआ कीती है अते हुण आपणी ज़िंदगी विच कदे वी पराई इसतरी वल नहीं तकेगा। उह इह वी सोचदा है कि हुण उह आपणे प्रभू दी महिमा नूं हर थां फैलावेगा अते संयमत जीवन जिउंएगा। आख़र विच किहा गिआ है कि उस दिन तों इह प्रतिगिआ उसदे हिरदे विच वस गई अते उस दिन तों बाअद उसने कदे वी पराई नारी वल नज़र नहीं मारी।
इति स्री चरित्र पख्याने त्रिया चरित्रे मंत्री भूप संबादे खोड़समो चरित्र समापतम सतु सुभम सतु॥१६॥३१५॥ -इस नाल राजे ते भूप विचला संवाद इह चरितर इथे समापत हुंदा है।
इस चरित्र दा नैतिक सार
इह उही चरित्र है कमजिस बारे बहुत सारे अखौती विदवान दसम बाणी दा विरोध करदे हन ते आखदे हन के दसम बाणी विच इह किउं लिखिआ है के "तुम मदरा पीवहु घनो हमै पिवावहु भंग॥। बिना पूरा चरितर पड़्हे समझे सवाल पुछणा गलत है। पूरा प्रसंग पड़्हन ते पता लगदा है के राजा ना ता भज सकदा सी ना पराई इसत्री नाल भोग दी इछा सी। जे भजदा है तां इसत्री स़ोर मचा के लोकां नूं कठा करन दी धमकी दे रही सी लोकां ने इह समझणा सी के जिसनूं उह इमानदार राजा समझदे हन किरदार दा पका उह इसतरी दी इज़त लुट रहिआ है। इस दुबिधा तों निकलण लई राजे ने छल करन वाले नूं छलिआ। आपणा किरदार पका रखिआ। बिनां काम दे वस आए चलाकी नाल उथों निकल गिआ। इस चरितर विच गहिरा आदेस़ छुपिआ है के किसे वी हाल विच काम विच गलतान नहीं होणा। होस़िआरी ते चलाकी वरतण विच कोई हरज नहीं जे आपणी इज़त बचदी है ते किसे होर दा नुकसान वी नहीं हुंदा।
चरितर बणदा है गुणां दे नाल। गुण हासल हुंदे हन मनुख दे हालात, उसदी संगत, उसदे निजी तजरबिआं नाल, उसदे गिआन नाल।
गुणां दी मति है गुरमति। गुणां दे गिआन नाल चरितर सवारिआ जांदा है। जिवें गुरबाणी आखदी है के "बिनु देखे उपजै नही आसा ॥ जदों अगिआनता हो जावे आस जाग जावे उसनूं काबू करन दा मारग है गिआन। चरितर दुआरा पातिस़ाह ने सपस़ट कीता है, समझाइआ है के वेखो भाई इह सब तुहाडे नाल वी हो सकदा है। धिआन रहे। बच के रहो।
आपणा चरितर देखण लई कोई स़ीस़ा नहीं हुंदा। तुसीं की करदे हों किवें सोचदे हों जदों कोई देख नहीं रहिआ हुंदा उस नाल तुहाडा चरितर पता लगदा है। तुहाडे अंदर की है, तुसीं गल कितनी सपस़ट करदेवहों, झूठ तां नहीं बोलदे, प्रधानगी दी, मस़हूर होण दी कितनी लालसा है इस नाल वी तुहाडा चरितर पता लगदा है। इमानदारी, निरपखदा, किरदार ते चरितर दी नींह हुंदी है। आचरण केवल बाहरी दिखावा हुंदा है सोझी तुहाडी काइआ दा प्रतिबिंब।

Source: ਚਰਿਤ੍ਰੋਪਖ੍ਯਾਨ ਖੋੜਸਮੋ/ ਸੋਲਾਂ (੧੬) – Charitropakhyan charitra ੧੬