
Source: ਚਰਿਤ੍ਰੋਪਖ੍ਯਾਨ ਚਰਿਤ੍ਰ ਉਨੰਜਾ (੧੯੦) – Charitropakhyan charitra 190
चरित्र इक सौ नबे/इक सौ नबवो – कथा चंचला अते मूरख चरित्र सिंघ राजा दी चरित्रोपख्यान ॥ स्री दसम ग्रंथ साहिब जी
अफजूं॥ चौपई॥ इक दिन बाग चंचला गई॥ हसि हसि बचन बखानत भई॥ स्री निसि राज प्रभा त्रिय तहा॥ ऐसी भाति उचारियो उहा॥१॥ – इक दिन चंचला नाम दी इक इसत्री बाग विच गई। हस हस के गलां करदी सी। उसदा रूप इतना मोहक सी के जिवें रात दी राणी दे फुल वरगा कोमल होवे। उसने ऐसी गल कही।
जौ राजे ते बारि भिराऊ॥ अपनी झाटै सभै मुंडाऊ॥ तब त्रिय होड सकल तुम हारहु॥ निजु नैनन इह चरित निहारहु॥२॥ – जे मैं राजे तों केस कटा के विखावां तां। आपणी झाट दे बाल राजे कोलो मुंडा के विखावां? उदों तुसीं सारीआं इसत्रीआं स़रा हार जाणीआं।तुसीं आपणी अखां नाल इह नजारा वेखिओ।
यौ कहि कै सुभ भेस बनायो॥ देव अदेवन को बिरमायो॥ चरित्र सिंघ राजा जब आयो॥ सुनि इह बचन चंचला पायो॥३॥ – इह कहि के उसने सोहणा भेस बणा लिआ जो देवतिआं नूं वी मोहित कर लवे। जदों चरित्र सिंघ नाम दा राजा उथे आइआ उसने उथे चंचला दी अवाज सुणी।
बैठ झरोखा दई दिखाई॥ राजा रहे रूप उरझाई॥ एक बार इह कौ जौ पाऊ॥ जनम सहस्र लगे बलि जाऊ॥४॥ – झरोखे विच बैठ के इह चंचला दीआं सहेलीआं वेख रहीआं सी। राजा चंचला दे रूप विच उरझ गिआ। राजा सोचदा सी के जे इक वार इस सुंदरी नूं पा लवां तां जनम सफल हो जावे।
पठै सहचरी लई बुलाई॥ प्रीति सहित रस रीतुपजाई॥ अबला तब मुरछित ह्वै गई॥ पानि पानि उचरत मुख भई॥५॥ – उसने आपणी सहेली नूं बुलाइआ अते पिआर नाल रसभरी प्रीत दी रीत जगाई। उदों चंचला अबला वाग मुरछित होण दा सवांग करन लगी। पाणी पाणी उचारन लगी।
उठ करि आपु राव तब गयो॥ ता कह पानि पयावत भयो॥ पानि पिए बहुरे सुधि भई॥ राजै फिरि चुंबन तिह लई॥६॥ – उदों राव (राजा) आप उठ के गिआ ते चंचला नूं पाणी पिलाउण लगा। पाणी पी के चंचला नूं सुध आई। राजे ने इस मौके दा फाइदा चक के चंचला नूं चुंबन कीता। पातिस़ाह दसम बाणी विच लिखदे हन के "थूक त्रिया कौ चाटि कहत अधराम्रित पायो॥ ब्रिथा जगत मै जनमु बिना जगदीस गवायो॥" मनुख नूं इह भुलेखा हुंदा है के इसत्री नूं चुंबन करके जा उसदा थुक चट के अंम्रित पी लिआ।
जब सुधि मै अबला कछु आई॥ बहुरि काम की केल मचाई॥ दोऊ तरन न कोऊ हारै॥ यौ राजा तिह साथ बिहारै॥७॥ – जदों चंचला नूं होस़ आइआ (उसने होस़ विछ आण दा नाटक कीता) तां काम रस विच डुब गए। इस तरां राजे ने उस नाल भोग कीता। दसम पातिस़ाह दसम बाणी विछ आखदे हन के "मूत्र धाम कौ पाइ कहत हम भोग कमावहि॥ पुरूस नूं इसत्री दा मूतर धाम पा के इंज लगदा है जिवे। भोग कमा लिआ। पर जगदीस़/अकाल/प्रभ दी सोझी तों बिनां जनम बिरथा जादा है।
बहुरि बाल इह भाति उचारी॥ सुनो राव तुम बात हमारी॥ त्रिय की झाटि न मूंडी जाई॥ बेद पुरानन मै सुनि पाई॥८॥ – उदों चंचला ने भोलेपन नाल राजे नूं कहिआ के मैं बेदां पुराणा विच सुणिआ है के इसत्री दी झार मुंडी नहीं जा सकदी।
हसि करि राव बचन यौ ठान्रयो॥ मै अपुने जिय साच न जान्यो॥ तै त्रिय हम सो झूठ उचारी॥ हम मूंडैगे झाटि तिहारी॥९॥ – इह सुण के राजा उसदी चाल विच फस गिआ ते आखदा तूं झूठ बोलदी हैं, मैं इह तैनूं कर के विखाउंदा हां।
तेज असतुरा एक मंगायो॥ निज कर गहि कै राव चलायो॥ ता की मूंडि झाटि सभ डारी॥ दै कै हसी चंचला तारी॥१०॥ – राजे ने तेज उसतरा मंगवाइआ ते चंचला दी झांट मुंड दिती। इह वेख के चंचला ताड़ी मार के हस पई।
दोहरा॥ पानि भरायो राव ते निजु कर झाटि मुंडाइ॥ होड जीत लेती भई तिन अबलान दिखाइ॥११॥ – चंचला ने राजे तों पाणी भरवा के दिखा दिता। स़रत अनुसार राजे तों आपणी झांट मुंडवा के विखा दिती। उहनां अबलावां/सहेलीआं दे मुहरे आपणी चतुराई दिखा के होड (सुंदरता-मुकाबले) विच जित हासल कर लई। उह खुस़ सी के उसने राजे नूं किवें काम विच फसा के आपणी स़रत जित लई।
इति स्री चरित्र पख्याने त्रिया चरित्रे मंत्री भूप संबादे इक सौ नबवो चरित्र समापतम सतु सुभम सतु॥१९०॥३६००॥ – इस नाल राजे ते भूप विचला संवाद इह चरितर इथे समापत हुंदा है।
इस चरित्र दा नैतिक सार
दसम पातिस़ाह ने इह चरितर लिखिआ इह दरसाउण लई के किवें वडे वडे राजे तों वी रूप अते काम दुआरा छल के उह कंम करवाए जा सकदे हन जो राजे नूं स़ोभा नहीं दिंदे। राजे दी मति काम वास़ना ने मार लई ते भोग रस विच लिपत उस नूं इह पता नहीं लगिआ के ॳसु दा इसतेमाल हो रहिआ है। इह चरितर किरदार दी कमीं नूं दरसाउंदा है। दसम पातिस़ाह आखदे हन "मूत्र धाम कौ पाइ कहत हम भोग कमावहि॥ थूक त्रिया कौ चाटि कहत अधराम्रित पायो॥ ब्रिथा जगत मै जनमु बिना जगदीस गवायो॥, काम वासना ते काम दे नस़े विच वडे वडे सूरमे बहादर आपणा राज तक गवा लैंदे हन। बिअंत उदाहरणां हन संसार विच अनेका जरनैल त्रिआ चरितर विच फस के बलैकमेल हुंदे हन। खालसे नूं इह चरितर आगाह करदे हन के आपणे कछैरे दे नाड़े काम विच फस के ढिले नहीं होण देणे। पराई इसत्री नूं धी भैण जाणना है ते धिआन गिआन वल़ रखणा है।
दसम विरोधी अखौती विदवान "तेज असतुरा एक मंगायो॥ निज कर गहि कै राव चलायो॥ ता की मूंडि झाटि सभ डारी॥ दै कै हसी चंचला तारी॥ इस पंकती नूं असलील कहि के दसम पातिस़ाह ते सवाल खड़े करदे हन पर पूरा चरितर विचारन तों भजदे हन। साडी बेनती है के पूरा चरितर विचार करिआ करो। अस़लीलता स़बदां विच नहीं हुंदी, अंगां, झाटां विच नहीं हुंदी। असलीलता काम वास़ना मन दा रोग है। डाकटर ने बिमतरी दा इलाज करना होवे उसनै स़बदां दा संकोच नहीं करना हुंदा है। तुसीं दसम पातिस़ाह नूं जवाक ना समझो। बहुत गहिरे भेद दसे हन चरितरां विच पातिस़ाह ने।
चरितर बणदा है गुणां दे नाल। गुण हासल हुंदे हन मनुख दे हालात, उसदी संगत, उसदे निजी तजरबिआं नाल, उसदे गिआन नाल।
गुणां दी मति है गुरमति। गुणां दे गिआन नाल चरितर सवारिआ जांदा है। जिवें गुरबाणी आखदी है के "बिनु देखे उपजै नही आसा ॥ जदों अगिआनता हो जावे आस जाग जावे उसनूं काबू करन दा मारग है गिआन। चरितर दुआरा पातिस़ाह ने सपस़ट कीता है, समझाइआ है के वेखो भाई इह सब तुहाडे नाल वी हो सकदा है। धिआन रहे। बच के रहो।
आपणा चरितर देखण लई कोई स़ीस़ा नहीं हुंदा। तुसीं की करदे हों किवें सोचदे हों जदों कोई देख नहीं रहिआ हुंदा उस नाल तुहाडा चरितर पता लगदा है। तुहाडे अंदर की है, तुसीं गल कितनी सपस़ट करदेवहों, झूठ तां नहीं बोलदे, प्रधानगी दी, मस़हूर होण दी कितनी लालसा है इस नाल वी तुहाडा चरितर पता लगदा है। इमानदारी, निरपखदा, किरदार ते चरितर दी नींह हुंदी है। आचरण केवल बाहरी दिखावा हुंदा है सोझी तुहाडी काइआ दा प्रतिबिंब।

Source: ਚਰਿਤ੍ਰੋਪਖ੍ਯਾਨ ਚਰਿਤ੍ਰ ਉਨੰਜਾ (੧੯੦) – Charitropakhyan charitra 190