Source: ਚਰਿਤ੍ਰੋਪਖ੍ਯਾਨ ਚਰਿਤ੍ਰ ਅਠਤਾਲੀ (੪੮) – Charitropakhyan charitra 48

चरित्रोपख्यान चरित्र अठताली (४८) – Charitropakhyan charitra 48

चरित्र अठताली – कथा जहांगीर दे स़िकार ते जाण दा प्रसंग(गुरू गोबिंद सिंघ जी॥ चरित्रोपख्यान॥ 891 ॥ स्री दसम ग्रंथ साहिब जी महाराज)

अफजूं॥ दोहरा॥ जहागीर पातिसाह के बेगम नूर जहा॥ बसि कीना पति आपना इह जस जहा तहा॥१॥ – जहांगीर दी बेगम नूर जहान सी जिसने आपणे पती नूं काबू कीता होइआ सी।

चौपई॥ नूर जहा इमि बचन उचारे॥ जहागीर सुनु साह हमारे॥ हम तुम आजु अखेटक जैहैं॥ सभ इसत्रिन कह साथ बुलैहैं॥२॥ – नूर जहां ने जहांगीर नूं बचन उचारे के असीं अखेटक भाव स़िकार ते जावांगे।

दोहरा॥ जहागीर ए बचन सुनि खेलन चड़ा सिकार॥ सखी सहेली संग लै आयो बनहि मंझार॥३॥ अरुन बसत्र तन महि धरे इमि अबला दुति देहि॥ नर बपुरे का सुरन के चित चुराए लेहि॥४॥ नवल बसत्र नवलै जुबन नवला तिया अनूप॥ ता कानन मै डोलही रति से सकल सरूप॥५॥ इक गोरी इक सावरी हसि हसि झूमर देहि॥ जहागीर नर नाह की सगल बलैया लेहि॥६॥ – वंन सुवंने नवें ते सोणे साफ़ कपड़े पा, तिआर होके दासीआं नाल लेके स़िकार लई तिआर हो गिआ। दासीआं वी सोहणे कपड़े पा चित चोरी करन वाला सिंगार करके नाल तिआर हो गईआं। कोई गोरी सी कोई सावली सी। गहिणे बसतर सोहणे पाए होए सी।

चौपई॥ सब त्रिय हथिन अरूड़ित भई॥ सभ ही हाथ बंदूकै लई॥ बिहसि बिहसि करि बचन सुनावै॥ जहागीर कह सीस झुकावै॥७॥ सभ इसत्रिन कर जोरै कीनौ॥ एक म्रिगहि जाने नहि दीनौ॥ केतिक बैठ बहल पर गई॥ है गै किती अरूड़ित भई॥८॥ – सारीआं ने हथ विछ स़सतर फड़े होए सी। जहांगीर अगे सिर झुका के सलाम करदीआं पईआं सी।

दोहरा॥ किनहूं गही तुफंग कर किनहूं गही क्रिपान॥ किनहूं कटारी काढि ली किनहूं तनी कमान॥९॥ चौपई॥ प्रिथम म्रिगन पर स्वान धवाए॥ पुनि चीता ते हरिन गहाए॥ बाज जुरन का किया सिकारा॥ नूर जहा पर प्रीति अपारा॥१०॥ रोझ हरिन झंखार संघारे॥ नूर जहा गहि तुपक प्रहारे॥ किनहूं हने बेगमन बाना॥ पसुन करा जम धाम पयाना॥११॥ – किसे ने बंदूक फड़ी किसे ने किरपान फड़ी सी। हिरन मारे, म्रिग मारे, जंगली सूर मारे। नूर जहान ते बिअंत प्रेम बरसा रहे सी।

दोहरा॥ अधिक रूप बेगम निरखि रीझि रहै म्रिग कोटि॥ गिरे मूरछना ह्वै धरनि लगे बिना सर चोटि॥१२॥ जिन कै तीखन असि लगे लीजत तिनै बचाइ॥ जिनै द्रिगन के सर लगे तिन को कछु न उपाइ॥१३॥ चौपई॥ किती सहचरी तुरै धवावै॥ पहुचि म्रिगन को घाइ लगावै॥ किनहूं म्रिगन द्रिगन सर मारे॥ बिनु प्रानन गिरि गए बिचारे॥१४॥ इही भाति सो कीआ सिकारा॥ तब लौ निकसा सिंघ अपारा॥ यह धुनि साह स्रवन सुनि पाई॥ सकल नारि इकठी ह्वै आई॥१५॥ – नूरजहान वी इतनी सोहणी सी के म्रिग वी मूरछत हो जाण वेख के। भांत भांत दे जानवरां दा स़िकार कीता। स़िकार खेडदे अचानक इक वडा सिंघ (स़ेर) मुहरे आ गिआ।

दोहरा॥ बहु अरना भैसान को आगे धरा बनाइ॥ ता पाछे हजरति चले बेगम संग सुहाइ॥१६॥ चौपई॥ जहागीर तकि तुपकि चलाई॥ सो नहि लगी सिंघ के जाई॥ अधिक कोप करि केहरि धायो॥ पातिसाह के ऊपर आयो॥१७॥ हरि धावत हथिनी भजि गई॥ नूर जहादिक ठाढ न पई॥ जोध बाइ यह ताहि निहारियो॥ ताकि तुपक को घाइ प्रहारियो॥१८॥ – आखदे बहुत सारे जंगली जानवरां भैसिआं नूं अगे रख हसरत (तंज भरे स़बदां नाल जनाब जां मिसटर) पिछे आपणी बेगम नाल तुरै जांदा सी। जहांगीर ने बंदूक दी गोली चलाई जो स़ेर दे वजी नहीं। निस़ाना चूक गिआ। हुण स़ेर बादस़ाह दे उपर रोस नाल हमला कीता। हाथी भज पिआ। बेगम दी ठाठ वी ना रही। उथे जोध बाई नाम दी इसतरी वी सी। उसने आपणी बंदूक नाल निस़ाना लाइआ।

दोहरा॥ सिंघ प्रान तब ही तजे लगे तुपक के घाइ॥ तीन सलामै तिन करी जहागीर को आइ॥१९॥ चौपई॥ अधिक खुसी हजरति जू भए॥ जनु मुहि प्रान आजु इह दए॥ धंन्य धंन्य निजु त्रिय कह कीनो॥ प्रान दान हम को इन दीनो॥२०॥ – जोध बाई दी चलाई गोली स़ेर दे लगी ते उह नारिआ गिआ। जोध बाई ने आ के तिंन सलाम जहांगीर नूं कीते। जहांगीर बहुत खुस़ होइआ। आखदा अज मैनूं प्राण दान दिता है जोध बाई ने। धंन धंन कहिआ जहांगीर ने जोध बाई नूं।

दोहरा॥ नूर जहा की सहचरी कौतक सकल निहार॥ जहागीर स्रवनन सुनत भाख्यो बचन सुधारि॥२१॥ – नूर जहान ने इह गल सुणी ते बचन कहे।

चौपई॥ जिन केहरि त्रिय बली संघारो॥ तिह आगे क्या मनुख बिचारो॥ हाहा दैया कह क्या करियै॥ ऐसी ढीठ नारि ते डरियै॥२२॥ – जिहड़ी इसत्री इतनी किहर नाल बली (बलवान स़ेर) नूं संघारिआ होवे उसदे अगे मनुख दी की चलणी। ऐसी इसत्री तों तां डर के रहिणा चाहीदा है।

अड़िल॥ जहागीर ए बचन जबै स्रवनन सुन्यो॥ चित मै अधिक रिसाइ सीस अपुनो धुन्रयो॥ ऐसी त्रिय के निकट न बहुरे जाइयै॥ हो करै देह को घात बहुरि क्या पाइयै॥२३॥ – जिहड़ा जहांगीर इक पल पहिलां खुस़ सी, धंनवादी सी जोध वाई दा हुण उह सोचीं पै गिआ। सिर झटक के डर गिआ। जोध बाई ने कहिआ ऐसी इसतरी दे निकट नहीं जाणा चाहीदा की पता देह नूं कदों घाण कर देवे।

चौपई॥ जहागीर सुनि बचन डरान्रयो॥ त्रिय को त्रास अधिक जिय मान्यो॥ सिंघ हनत जिह लगी न बारा॥ तिह आगे क्या मनुख बिचारा॥२४॥ – इह बचन सुण के जहांगीर डर गिआ। जिहड़ी इसत्री नूं सूरबीर मंनदा सी जिसने स़ेर मारण लगे देर नहीं लाई हुण उसतों डर गिआ ते निंदणजोग समझण लग पिआ।

दोहरा॥ अति बचित्र गति त्रियन की जिनै न जानै कोइ॥ जो बाछै सोई करै जो चाहै सो होइ॥२५॥पियहि उबारा हरि हना एक तुपक के ठौर॥ ता कौ छलि पल मै गई भई और की और॥२६॥ जहागीर पतिसाह तब मन मै भया उदास॥ ता संग सो बातैं सदा डर ते भया निरास॥२७॥ इति स्री चरित्र पख्याने त्रिया चरित्रे मंत्री भूप संबादे अठतालीसवो चरित्र समापतम सतु सुभम सतु॥४८॥८४५॥ – आखदे त्रीआ चरितर अत बचित्र है, समझ नहीं उसदे नाल जो चाहे कर सकदी है। जिसने पती नूं बचाइआ उसनूं, नाल पती नूं इक पल विच छल गई। इक पल विच सारी सथिती दा रुख बदल दिता। जहांगीर उदों उदास हो गिआ ते डर कारण जोध बारी प्रती निरास हो गिआ। इस नाल ही मंत्री अते भूप विचला समवाद संपूरन हुंदा है जिसदा वखिआनबदसम पातिस़ाह कर रहे हन।

इस चरित्र दा नैतिक सार

जहांगीर स़ुकरगुज़ार सी बीबी दा जिसने स़ेर मार के उसदी जान बचाई। नूरजहां नूं उसदे किरदार दा पता सी। उसने जहांगीर दे मन विच डर पैदा कर दिता इह कहि के की जिहड़ी इसत्री स़ेर मार सकदी है उह खतरनाक हुंदी है उस तों बच के रहिणा चाहीदा है। जहांगीर गलां विच आ गिआ। इक पल उह स़कुरगुज़ार सी, अगले पल उसे औरत तों डरन लग पिआ।

इह दरसाउंदा है के इसत्री कितनी असानी नाल डरपोक ते कंन दे कचे मनुख दे मन ते काबू पा लैंदी है। इसत्री ते पुरख दा रिस़ता प्रेम दा हुंदा है भरोसे दा। पर पुरख काम कारण किसे दूजी इसत्री ते मोहित ना हो जावे इह डर इसत्री नूं हमेस़ा रहिंदा है खास करके जदों उह ताकतवर राजा होवे। इह डर नूरजहां नूं वी सी। राजिआं नूं हमेस़ा राज खोह जाण दा डर हुंदा है जान दा डर हुंदा है खास करके जहांगीर वरगे नूं जिसनूं आपणे भरा खुसरो दी बगावत दा डर सी। जहांगीर दीआं २०-२५ बेगमां सी। नूरजहां नूं वी डर सी के जहांगीर किसे सूरमता कारण दूजी बेगम बणां के उसनूं जिआदा प्रेम ना करन लग जावे। इस कथा विच इसत्री ते पुरख दोहां दे किरदार समझाए गए हन उदाहरण सरूप।

आदि बाणी विच वी इही गल आखी है "जोरा दा आखिआ पुरख कमावदे से अपवित अमेध खला॥। दसम बाणी ने कहाणी दे राहीं चरितर दा उदाहरण दिता है।

चरितर बणदा है गुणां दे नाल। गुण हासल हुंदे हन मनुख दे हालात, उसदी संगत, उसदे निजी तजरबिआं नाल, उसदे गिआन नाल।

गुणां दी मति है गुरमति। गुणां दे गिआन नाल चरितर सवारिआ जांदा है। जिवें गुरबाणी आखदी है के "बिनु देखे उपजै नही आसा ॥ जदों अगिआनता हो जावे आस जाग जावे उसनूं काबू करन दा मारग है गिआन। चरितर दुआरा पातिस़ाह ने सपस़ट कीता है, समझाइआ है के वेखो भाई इह सब तुहाडे नाल वी हो सकदा है। धिआन रहे। बच के रहो।

आपणा चरितर देखण लई कोई स़ीस़ा नहीं हुंदा। तुसीं की करदे हों किवें सोचदे हों जदों कोई देख नहीं रहिआ हुंदा उस नाल तुहाडा चरितर पता लगदा है। तुहाडे अंदर की है, तुसीं गल कितनी सपस़ट करदेवहों, झूठ तां नहीं बोलदे, प्रधानगी दी, मस़हूर होण दी कितनी लालसा है इस नाल वी तुहाडा चरितर पता लगदा है। इमानदारी, निरपखदा, किरदार ते चरितर दी नींह हुंदी है। आचरण केवल बाहरी दिखावा हुंदा है सोझी तुहाडी काइआ दा प्रतिबिंब।


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