Source: ਚਰਿਤ੍ਰੋਪਖ੍ਯਾਨ ਚਰਿਤ੍ਰ ਅਠਾਠਵਾਂ (੮੮) – Charitropakhyan charitra 88

चरित्रोपख्यान चरित्र अठाठवां (८८) – Charitropakhyan charitra 88

चरित्र अठाठवां – कथा स़ाहूकार दा पुतर (गुरू गोबिंद सिंघ जी॥ चरित्रोपख्यान॥ 891 ॥ स्री दसम ग्रंथ साहिब जी महाराज)

इह कथा मनुखी संबंधां, चतुरता, धोखे अते निआं दी गहिरी समझ दिंदी है।

चरित्रो = चाल-चलण, किरदार, मनुखी वरतारा
पखयान = वरणन, कथा, प्रसंग

इह मनुखी चाल-चलण अते किरदारां दे वरणन वालीआं कथावां दा संग्रह है। जिथे आदि ग्रंथ साहिब जी दी बाणी विकार तजण दी गल करदी है ते आखदी है के काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईरखा, द्वेस़, झूठ, निंदिआ, चुहगली आदी विकार मनुख दी काइआ नूं गालदे हन, दसम बाणी चरित्र पखिआन दुआरा उदाहरण दे के समझाउंदी है के मनुखी किरदार रिस़तिआं तों उपर काम दुआरा किवें ग्रसत हुंदा है। किवें वडे वडे मुंन देवते, साध, गिआनी वी काम अगे डोल जांदे हन। जदों मनुख काम दे अधीन हुंदा है आपणे दोस, मितर, रिस़तेदारां नूं वी ठगदा है। लोड़ वेले, मुसीबत वेले गधे नूं पिउ ही नहीं बणाउंदा कई वार ऐसा कंम वी कर जांदा है जो सोचण वेखण वाले नुं हैरान कर दिंदा है। वेखो इस चरितर विच वैद नूं की करना पिआ। मुसीबत इंनसान नूं की कुझ करवा सकदी है।

साहु एक गुजरात के ता के ग्रिह इक पूत॥ सौदा कौ चौकस करै पितु ते भयो सपूत॥१॥
अरथ – गुजरात दा इक स़ाहूकार सी। उहदे घर इक पुतर सी। जो पिता दा सपुतर सी अते विउपार विच बड़ा चतर सी॥१॥

नाऊ के इक पुत्र सो ता के रहै प्यार॥ सूरति मै दोऊ एकसो कोऊ न सकै बिचार॥२॥
पदा अरथ -नाऊ=नाई। बिचार=पछाण।
अरथ – उस दा पिआर इक नाई दे पुतर नाल सी। स़कलों दोवें इको जिहे सन। (उन्हां नूं) कोई पछाण नहीं सकदा सी॥२॥

चौपई॥ साहु पुत्र ससुरारे चलो॥ संग लए नऊआ सुत भलो॥ गहिरे बन भीतर दोऊ गए॥ बचन कहत नऊआ सुत भए॥३॥
अरथ–चौपई, स़ाह दा पुतर सौहरे घर नूं चलिआ अते (आपणे) नाल नाई दे पुतर नूं लै लिआ। (जदों) दोवें संघणे बन विच गए (तां उस नाल) नाई दे पुतर ने बोल सांझे कीते॥३॥

नऊआ के सुत बचन उचारे॥ सुनो साहु सुत बैन हमारे॥ तब हौ यार तुमै पहिचानौ॥ मेरे कहियो अबै जौ मानौ॥४॥
अरथ
– नाई दे पुतर ने किहा–हे स़ाह दे पुतर! मेरी इक गल सुणो। मैं तद ही तुहानूं आपणा मितर मंनागा, जे हुणे मेरा किहा मंनो॥४॥

दोहरा॥ अस्व बसत्र सभ अपने तनकिक मो के देहु॥ यह बुगचा तुम लै चलौ चलि आगे फिरि लेहु॥५॥
पद अरथ – अस=घोड़ा।। तनकिक=बोड़्हा चिर। बुगचा=गठड़ी।
अरथ – दोहरा आपणा घोड़ा अते सारे बसत्र थोड़ी देर लई मैनूं दे दिओ अते इह गठरी तुसीं लै लओ अते लै के मेरे अगे चलो॥५॥

चौपई॥ साहु पुत्र सोई तब करियो॥ ता कौ बुगचा निजु सिरि धरियो॥ निजु घोरा पै ताहि चरायो॥ अपुने बसत्रन सो पहिरायो॥६॥
अरथ
– चौपई, स़ाह दे पुतर ने उसे तर्हां कीता। उस दी गठरी आपणे सिर उते धर लई। उस नूं आपणे घोड़े उते चड़्हा लिआ अते आपणे बसत्र उस नूं पवा दिते॥६॥

नऊआ सुत तिह भेख बनायो॥ दे बुगचा सुत साहु चलायो॥ ता के अति ही चित हरखानो॥ साहु पुत्र कछु भेद न जानो॥७॥
अरथ
– नाई दे पुतर ने उस दा भेस बणा लिआ अते गठरी दे के स़ाह दे पुतर नूं चला दिता। उस दा चित बहुत खुस़ सी, पर स़ाह दा पुतर कुझ वी भेद न समझ सकिआ॥७॥

दोहरा॥ चलत चलत ससुरारि कौ गाव पहूंच्यो आइ॥ उतरि न तिह सुत साहु के है पर लियो चराइ॥८॥
पुद अरथ – है=घोड़े ।।
अरथ – दोहरा, तुरदे तुरदे उह सौहरे पिंड आ पहुंचे। पर उस ने उतर के घोड़े उते स़ाह दे पुतर नूं न चड़्हाइआ॥८॥

साहु पुत्र तिह कहि रहियो लयो न तुरै चराइ॥ साहु पुत्र लखि तिह धनी सकल मिलत भे आइ॥९॥
अरथ
– स़ाह दा पुतर उस नूं कहिंदा रिहा (पर उस ने) घोड़े उते न चड़्हाइआ। उस धनी नूं स़ाह दा पुतर समझ के सभ मिलण लई आए॥९॥

चौपई॥ साहु पुत्र नऊआ करि मान्यो॥ नऊआ सुत सुत साहु पछान्यो॥ अति लजाइ मन मै वहु रहियो॥ तिन प्रति कछू बचन नहि कहियो॥१०॥
अरथ
– चौपई, स़ाह दे पुतर नूं नाई दा अते नाई दे पुतर नूं स़ाह दा पुतर कर के (सभ ने) पछाणिआ। उह (स़ाह दा पुतर) मन विच बहुत स़रमिंदा होइआ पर उस प्रति उस ने कोई बचन न किहा॥१०॥

दोहरा॥ नऊआ सुत के साहु की दीनी बधू मिलाइ॥ साहु पुत्र सो यौ कहियो दुआरे बैठहु जाइ॥११॥
पद अरथ – बधू=ाइसत्री ।
अरथ – दोहरा, नाई दे पुतर नूं स़ाह दे पुतर दी पतनी मिला दिती अते स़ाह दे पुतर नूं इस तर्हां किहा कि उह दरवाज़े उते जा के बैठे॥११॥

चौपई॥ तब नऊआ यौ बचन उचारे॥ कहौ काज इह करो हमारे॥ बहु बकरी तिह देहु चरावै॥ दिवस चराइ राति घर आवै॥१२॥
अरथ
– चौपई, तद नाई दे पुतर ने इस तर्हां किहा– (इस नूं) कहो कि मेरा इह कंम करे। इस नूं बहुत सारीआं बकरीआं चराउण लई दिओ। दिन नूं चरा के रात नूं आ जावे॥१२॥

दोहरा॥ साहु पुत्र छेरी लए बन मै भयो खराब॥ सूकि दूबरो तन भयो हेरे लजत रबाब॥१३॥
पद अरथ – छेरी = बकरी। लजत=लजिआ/ स़रम ।
अरथ – घर दो हरा स़ाह दा पुतर बकरीआं लै के बन विच खुआर हुंदा रिहा अते स़रम दा मारिआ सुक के रबाब वरगा दुबला हो गिआ॥१३॥

चौपई॥ अति दुरबल जब ताहि निहारियो॥ तब नऊआ सुत बचन उचारियो॥ एक खाट या के अब दीजै॥ मेरो कहियो बचन यह कीजै॥१४॥
पद अरथ – दुरबल=लिसा। निहारयो=देखिआ। नऊआ=नाई ।
अरथ – चौपई, जदों उस नूं बहुत दुरबल वेखिआ तद नाई दे पुतर ने किहा– हुण इस नूं इक मंजी दे दिओ अते मेरे कहे अनुसार इस तर्हां करो॥१४॥

दोहरा॥ खाट साहु के पुत्र लै अधिक दुख्य भयो चित॥ गहिरे बन मै जाइ कै रोवत पीटत नित॥१५॥
अरथ
– दोहरा, स़ाह दा पुतर मंजी लै के मन विच होर वी दुखी होइआ। संघणे बन विच जा के नित रोण पिटण लगिआ॥१५॥

महा रुद्र अरु पारबती जात हुतै नर नाहि॥ ता के दुखित बिलोकि कै दया भई मन माहि॥१६॥
अरथ
– महा रुदू अते पारबती स़ाह दे पुतर कोलों लंघ रहे सन। उस नूं दुखी वेख के (उन्हां दे) मन विच दइआ आ गई॥१६॥

चौपई॥ दया मान यौ बचन उचारे॥ सुनहु साहु के सुत दुख्रयारे॥ जाइ चमरु तू तू मुख कहि है॥ छेरी लगी भूंम मै रहि है॥१७॥
पद अरथ – चमरु।। चंबड़ जाणा। भूमि=धरती।
अरथ – चौपई, दइआवान हो के (उन्हां ने) इस तर्हां किहा]हे स़ाह दे दुखी पुतर! सुणो। जिस नूं तूं मूंह तों कहेंगा Ἐतूं चिमट जाἙ, तां उह बकरी भूमी नाल जुड़ जाएगी॥१७॥

दोहरा॥ जबै उझरु तू भाखि है तुरत वहै छुटि जाइ॥ जब लगियो कहि है नही मरै धरनि लपटाइ॥१८॥
अरथ
– दोहरा, जदों तूं वख हो जाण लई कहेंगा, उसे वेले उह खलास हो जाएगी। जद तक इस तर्हां नहीं कहेंगा, उह धरती नाल लग के मर जाएगी॥१८॥

चौपई॥ जबै चमरु तू वहि मुख कहै॥ चिमटियो अधर धरनि सो रहै॥ साचु बचन सिव के जब भयो॥ तब तिह चित यह ठाट ठट्रयो॥१९॥
अरथ
– जद उस (स़िव) ने मुख तों तूं चिमट जा’ किहा तां (उस दा) हेठला होठ (ἘअधरἙ) धरती नाल चिमट गिआ। जद स़िव दे बचन सचे सिंध होए, तां उस ने चित विच इह बणत बणाई॥१९॥

दोहरा॥ सभै चमरु तू मै बिना या पुर मै ह्वै जाहि॥ जह तह नर नारी हुती लगी रही छित माहि॥२०॥
पद अरथ – छित=धरती।
अरथ – (उस ने किहा-) मेरे बिना इस नगर दे सारे चिमट जाण। जिथे किथे जो नर नारी सी, सभ धरती नाल चिमट गई॥२०॥

सोत जगत बैठत उठत चिमट गए छिन माहि॥ कूक उठी पुर मै घनी नैक रही सुधि नाहि॥२१॥
अरथ
– सौंदे, जागदे, उठदे, बैठदे सारे ही छिण भर विच चिमट गए। स़हिर विच बहुत चीख चहाड़ा पै गिआ अते किसे विच स़ुध बुध न रही॥२१॥

पति धोती बाधित फसियो पाक पकावत त्रीय॥ नौआ त्रिय सोवत फसियो कछु न रही सुधि जीय॥२२॥
अरथ
– पती धोती बंन्हदिआं फस गिआ अते इसतरी रसोई तिआर करदी फस गई। नवीं विआही इसतरी (पती नाल) सुती होई फस गई अते (किसे नूं वी आपणे) जी दी होस़ न रही॥२२॥

चौपई॥ साहु पुत्र तबह ता के आयो॥ कहा भयो कहि तिसै सुनायो॥ जु कछु कहो मुहि काज कमाऊ॥ बैदहि ढूढि तिहारे ल्याऊ॥२३॥
अरथ
– चौपई तद स़ाह दा पुतर उस (नाई दे पुतर) कोल आइआ। जो (उस नाल) होइआ, उह उस नूं सुणाइआ। (स़ाह दे पुतर ने नाई दे पुतर नूं किहा–तुसीं) मैनूं जो कुझ कहो, उह कंम करांगा। तुहाडे लई वैद नूं लभ लिआवांगा॥२३॥

लै घोरी सुत साहु सिधायो॥ खोजि बैद के संग लै आयो॥ तह जंगल की हाजति भई॥ घोरी साहु पुत्र के दई॥२४॥
अरथ
– स़ाहुकार दा पुतर घोड़ी लै के तुरिआ ते वैद नूं लभके घोड़ी ते चड़ाके लै आइआं। रसते विच वैद नूं जंगल दी हाजत होई तां उहने घोड़ी स़ाहूकार दे पुतर नूं फड़ा दिती॥२४॥

दोहरा॥ जाइ बूटै तब बैठियो लई कुपीन उठाइ॥ डला भए पौछन लगियो कहियो चमरु तू ताहि॥२५॥
अरथ
– दोहरा तद उह लंगोटी चूक के इक बूटे पास जा बैठा अते (जदों) मिटी दा डला लै के (गुदा नूं) पूंझण लगिआ (तां स़ाह दे पुतर ने) किहा] Ἐतूं चिमट जा॥२५॥

हाथ लगोटी रहि गई डला फसियो बुरि माहि॥ चरन झार के संग रसे ताहि रही सुधि नाहि॥२६॥
पद अरथ – बुरि माहि=गुदा विच। झार=झाड़ ।
अरथ – लंगोटी (वैद) दे हथ विच रहि गई अते मिटी दा डला गुदा विच फस गिआ। (उस दे) पैर झाड़ी विच उलझ गए अते उस नूं कोई सुध बुध न रही॥२६॥

लए अस्वनी साहु के पूत पहूंच्यो आइ॥ कहियो बैद मै क्या करों इह दुख के सु उपाइ॥२७॥
पद अरथ – असूनी=घोड़ी।
अरथ – स़ाह दा पुतर घोड़ी लै के आ पहुंचिआ अते कहिण लगिआ] हे वैद! मैं की करां, इस दुख दा की उपा है॥२७॥

चौपई॥ साहु पुत्र तब बचन उचारो॥ सुनो बैद उपचार हमारो॥ हमरो इह आगे दुख भयो॥ इह उपचार दूरि ह्वै गयो॥२८॥
पद अरथ – उपचार = इलाज।
अरथ – चौंपई ,तद स़ाह दे पुतर ने किहा हे वैद! मेरा इलाज सुणो। मैनूं वी (इक वार) अगे इह दुख होइआ सी (जो) इह इलाज करन नाल दूर हो गिआ सी॥२८॥

दोहरा॥ या घोरी के भग बिखै जीभ दई सौ बार॥ तुरत रोग हमरो कटियो सुनहु बैद उपचार॥२९॥
अरथ – दोहरा, इस घोड़ी दी भग विच मैं सौ वार जीभ दिती सी। हे वैद! सुणो, इस इलाज नाल मेरा रोग तुरत कट गिआ सी॥२९॥

चौपई॥ तबै बैद सोऊ क्रिआ कमाई॥ ता के भग मै जीभ धसाई॥ कहियो चमरु तू सो लगि गई॥ अति हासी गदहा के भई॥३०॥
अरथ
– तद वैद ने उही क्रिआ कीती अते घोड़ी दी भग विच जीभ धस दिती। (स़ाह दे पुतर ने) किहा–Ἐतूं चिमट जा अते उह जुड़ गई। उस खोते (वैद) दी बहुत हासी होई॥३०॥

लए लए ता के पुर आयो॥ सगल गाव के दरस दिखायो॥ बैद कछू उपचारहि करौ॥ इन के प्रान छुटन ते डरौ॥३१॥
अरथ
– उस नूं नाल लै के पिंड विच आइआ अते सारे पिंड नूं नज़ारा विखाइआ। (पिंड दे इक वैद नूं किहा-) हे वैद! इस दा कुझ उपचार करो अते इस दे प्राण निकलण तों डरो॥३१॥

पुर जन बाच॥ दोहरा॥ अधिक दुखी पुर जन भए कछू न चलियो उपाइ॥ चलत फिरत या के निरखि रहे चरन लपटाइ॥३२॥
पद अरथ – लपटाइ=चंबड़ गए।।

अरथ – [पिंड वासीआं ने किहा]– दोहरा, पिंड दे लोक बहुत दुखी हो गए अते उन्हां दा कोई उपा न चलिआ। (स़ाह नूं) चलदा फिरदा देख के सारे उस दे चरनी लग गए॥३२॥

चौपई॥ हमरे नाथ उपाइहि कीजै॥ अपने जानि राखि करि लीजै॥ इनै करी कछु चूक तिहारी॥ महा रोग ते लेहु उबारी॥३३॥
अरथ
– चौपई ,हे नाथ! साडा (कोई) उपा करो अते आपणा जाण के (साडी) रखिआ करो। इन्हां ने तुहाडी कोई ग़लती कीती होवेगी। (इन्हां नूं इस) महा रोग तों बचा लवो॥३३॥

साह सुत बाच॥ चौपई॥ सकल कथा तिन भाखि सुनाई॥ पुर लोगन सभहूं सुनि पाई॥ लै दूजी कंन्या तिह दीनी॥ भाति भाति उसतति मिल कीनी॥३४॥
अरथ
– [स़ाह दे पुतर ने किहा]- चौपई, उस ने सारी गल दस दिती अते पिंड दे सारे लोकां ने सुण लई। उस नूं दूजी कंनिआ दे दिती अते मिल के भांत भांत दी उसतत कीती॥३४॥

और सकल पुर छोरि उबारियो॥ नऊआ सुत चिमटियो ही मारियो॥ ब्याह दूसरो अपनो कीनो॥ निजु पुर के बहुरो मगु लीनो॥३५॥

पद अरथ – छोरि=छुडा के। उबारियो = बचा लिआ ।
अरथ – उस ने सारे पिंड नूं मुकत कर के (उन्हां नूं) उबारिआ अते नाई दे पुतर नूं चिमटिआ होइआ ही मार दिता। आप दूजा विआह कीता अते फिर आपणे नगर दा राह पकड़िआ॥३५॥

इति स्री चरित्र पख्याने पुरख चरित्रे मंत्री भूप संबादे अठासठवो चरित्र समापतम सतु सुभम सतु॥६८॥१२२२॥अफजूं॥
अरथ
– मंतरी राजा वारतालाप अठानवी’ कथा समापत॥६८॥१२२२॥अफजूं॥

कथा दा नैतिक सार (मोरल):
“अंध विस़वास अते अति भरोसा अकसर विघन दा कारन बणदा है। चतुरता नाल भरोसे दी दुरवरतों करन वाला अंत विच आपणे ही चालां विच फस जांदा है। परमातमा दी किरपा अते सच दी सहाइता नाल निआं हो जांदा है।”

मुख सिखिआवां:
अंध भरोसा: स़ाहूकार दा पुतर आपणे मितर ‘ते अति भरोसा करदा है, जो उसदे विरुध चाल चलदा है।
चतुरता दी दुरवरतों: नाई दा पुतर चतुरता नाल भेस बदल के उसदी पतनी अते पदवी हासल कर लैंदा है।
दइआ अते निआं: स़िव जी अते पारबती दी दइआ नाल सचाई दी जित हुंदी है।
समाजिक निआं: अंत विच पिंड दे लोक सच नूं मंनदे हन, अते धोखेबाज नूं सज़ा मिलदी है।

जिहनां नूं चरित्रां दी भास़ा अपमान जनक लगदी है, असलील लगदी है उह लोग हन जिहड़े आपणे आप नूं विदवान तां मंनदे हन पर अंदरों विकारां नाल भरे हन। जिहड़े अंगां दे नाम लैण तक संकोच करदे हन। हथ नूं हथ कहिणगे मगर पुरख दे गुपत अंगां नूं तोतो, नुंनू ते होर पता नहीं की की नाम दे छडदे हन जिवें सुणन वाले नूं पता नहीं की कहिआ जा रहिआ है। स़बदां विच अस़लीलता दिस जांदी है। स़बद सुण के ही काम जां स़रम भारू हो जांदी है। निगा साफ़ नहीं, मन साफ़ नहीं ते दोस़ स़बदां नूं दिंदे हन। कई तां अंदरों दसम पातिस़ाह नाल घिरणा वी करदे हन। आपणा मन साफ़ नहीं ते स़बदां नूं माड़ा आखदे ने। जदों मन साफ़ होवे स़बद किहो जिहे वी होण, भावें मुहरे नगन अवसथा विच औरत किउं ना खड़ी होवे गुरमुखां विच काम नहीं जागदा। जिहड़े सूरमे होए हन पंथ विच उहनां मुहरे नगन इसत्री वी आ जांदी सी उह दसम पिता दी सिखिआ, गुरबाणी दी सिखिआ कारण गोले नहीं। अज दा सिख पड़्ह लिख के वी गवार ही रहि गिआ।


Source: ਚਰਿਤ੍ਰੋਪਖ੍ਯਾਨ ਚਰਿਤ੍ਰ ਅਠਾਠਵਾਂ (੮੮) – Charitropakhyan charitra 88