
Source: ਕੀ ਖਾਣਾ ਹੈ? ਤੇ ਕੀ ਨਹੀਂ ਖਾਣਾ ਹੈ?
असीं बिबेक ते गल कर चुके हां अते मास ते वी। पंथ विछ खाण पीण ते झगड़ा नहीं मुकदा इस लई गुरबाणी तों पंकतीआं खोज के नीचे लिखीआं हन जिहनां नूं आपा समां ला के विचार करांगे। जे पिछले लेख वेखणे होण तां देखो
गुरमति विच बिबेक दे अरथ की हन?
मास खाणा (Eating Meat) अते झटका (Jhatka)
जिसदा विस़ा गिआन होवे, गुरमति समझणा होवे, सच होवे उसने की ग्रहण करना निचलीआं पंकतीआं पड़्ह के विचारन।
नाम रतन को को बिउहारी॥ अंम्रित भोजनु करे आहारी॥
ब्रहम गिआनी का भोजनु गिआन॥ नानक ब्रहम गिआनी का ब्रहम धिआनु॥
साची संगति थानु सचु सचे घर बारा॥ सचा भोजनु भाउ सचु सचु नामु अधारा॥ सची बाणी संतोखिआ सचा सबदु वीचारा॥
सची सिफति सालाह कपड़ा पाइआ॥ सचा अंम्रित नामु भोजनु आइआ॥ गुरमती खाधा रजि तिनि सुखु पाइआ॥
भोजनु नामु निरंजन सारु॥ परम हंसु सचु जोति अपार॥ जह देखउ तह एकंकारु॥
पुत्र कलत्र कुटंब संगि जुरिआ॥ भोजनु अनिक प्रकार बहु कपरे॥ सरपर गवनु करहिगे बपुरे॥
सीगार मिठ रस भोग भोजन सभु झूठु कितै न लेखए॥
मिथिआ रसना भोजन अन स्वाद॥ मिथिआ चरन पर बिकार कउ धावहि॥ मिथिआ मन पर लोभ लुभावहि॥
भोजनु भाउ भरमु भउ भागै॥
हरि अंम्रित नामु भोजनु नित भुंचहु सरब वेला मुखि पावहु॥ जरा मरा तापु सभु नाठा गुण गोबिंद नित गावहु॥
मनु तनु सीतलु होइआ भाई भोजनु नाम अधारु॥
भोजन गिआनु महा रसु मीठा॥ जिनि चाखिआ तिनि दरसनु डीठा॥ दरसनु देखि मिले बैरागी मनु मनसा मारि समाता हे॥
थालै विचि तै वसतू पईओ हरि भोजनु अंम्रितु सारु ॥
थालै विचि तै वसतू पईओ हरि भोजनु अंम्रितु सारु॥ जितु खाधै मनु त्रिपतीऐ पाईऐ मोख दुआरु॥ इहु भोजनु अलभु है संतहु लभै गुर वीचारि॥
संत भगत परवाणु जो प्रभि भाइआ॥ सेई बिचखण जंत जिनी हरि धिआइआ॥ अंम्रितु नामु निधानु भोजनु खाइआ॥
बिखिआ महि किन ही त्रिपति न पाई॥ जिउ पावकु ईधनि नही ध्रापै बिनु हरि कहा अघाई॥ रहाउ॥ दिनु दिनु करत भोजन बहु बिंजन ता की मिटै न भूखा॥ उदमु करै सुआन की निआई चारे कुंटा घोखा॥
सीतल सांति महा सुखु पाइआ संतसंगि रहिओ ओल॑ा॥ हरि धनु संचनु हरि नामु भोजनु इहु नानक कीनो चोल॑ा॥
त्रिपति भई सचु भोजनु खाइआ॥ मनि तनि रसना नामु धिआइआ॥
नामु जपै भउ भोजनु खाइ ॥
बिनवंति नानकु सदा त्रिपते हरि नामु भोजनु खाइआ ॥
सचा भोजनु भाउ सचा है सचै नामि सुखु होई राम ॥
रजि रजि भोजनु खावहु मेरे भाई॥ अंम्रित नामु रिद माहि धिआई॥
त्रिपति अघाए पेखि प्रभ दरसनु अंम्रित हरि रसु भोजनु खात ॥
अनिक प्रकार भोजन नित खाते मुख दंता घसि खीन खइआ॥ मेरी मेरी करि करि मूठउ पाप करत नह परी दइआ॥
अभिआगत एहि न आखीअनि जिन के चित महि भरमु॥ तिस दै दितै नानका तेहो जेहा धरमु॥ अभै निरंजनु परम पदु ता का भूखा होइ॥ तिस का भोजनु नानका विरला पाए कोइ॥
हरि नामु भोजनु सचु आधारा॥ सदा त्रिपति पवित्रु है पावनु जितु घटि हरि नामु निवासी हे॥
नामु हमारै भोजन भाउ॥ नामु हमारै मन का सुआउ॥ नामु न विसरै संत प्रसादि॥ नामु लैत अनहद पूरे नाद॥
भगतां का भोजनु हरि नाम निरंजनु पैन॑णु भगति बडाई॥ निज घरि वासा सदा हरि सेवनि हरि दरि सोभा पाई॥
सचु वरतु संतोखु तीरथु गिआनु धिआनु इसनानु॥ दइआ देवता खिमा जपमाली ते माणस परधान॥ जुगति धोती सुरति चउका तिलकु करणी होइ॥ भाउ भोजनु नानका विरला त कोई कोइ॥
खान पान मीठ रस भोजन अंत की बार होत कत खारी॥ नानक संत चरन संगि उधरे होरि माइआ मगन चले सभि डारी॥
सचु तीरथु सचु इसनानु अरु भोजनु भाउ सचु सदा सचु भाखंतु सोहै॥ सचु पाइओ गुर सबदि सचु नामु संगती बोहै॥ जिसु सचु संजमु वरतु सचु कबि जन कल वखाणु॥ दरसनि परसिऐ गुरू कै सचु जनमु परवाणु॥
नामु नावणु नामु रस खाणु अरु भोजनु नाम रसु सदा चाय मुखि मिस्ट बाणी॥
अभै निरंजन परम पदु ता का भीखकु होइ॥ तिस का भोजनु नानका विरला पाए कोइ॥

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