
Source: ਖਸਮ, ਪਿਤਾ, ਪਿਓ ਜਾਂ ਬਾਪ ਕੌਣ?
कुझ दिन पहिलां इक दसम विरोधी ग्रुप ते स़ामिल होइआ। जदों उहनां नूं पता लगा के मैं दसम बाणी दा विरोध नहीं करदा तां उथे बहुते वीर मंदी स़बदावली ते उतर आए। कोई विचार वरचा करना ही नहीं चाहुंदे सी। इलज़ाम लाइआ के दसम बाणी मंनण वाले दो खसम रखी बैठे ने। मैं पुछिआ के दसो गुरमति विच खसम किस नूं कहिआ तां कोई जवाब नहीं आइआ। कडो कडो करन लग पए सारे ही। बड़े वीर भैणां अखौती बिदवान छाती ठोक ठोक के खसम खसम करदे हन, कई पोथी साहिब नूं खसम, पिता बाप दसी जाणगे। जदों कोई तरक ना होवे जां दलील ना होवे, जां दसम ग्रंथ नूं भंडणा होवे तां आख दिंदे हन के तुसीं दो खसम रखे हन। अज दी इस पोसट विच वेखदे हां के भगतां ने, गुरूआं ने खसम, बाप जां पिता किस नूं कहिआ है। जिहड़ी बाणी खसम बारे दस रही है, पिता बाप बारे दस रही है उस नूं ही किवें खसम आखी जांदे ने कई अखौती विदवान। साडे लई आदि बाणी/पोथी साहिब दे विच दा गिआन ते दसम बाणी दोवें ही पूजनीक हन किउंके गिआन दे रहे ने। खसम बारे की कहिआ गिआ है इह विचारीए।
गुरबाणी दा फुरमान है "इहु सचु सभना का खसमु है जिसु बखसे सो जनु पावहे॥ – "जग रचना सभ झूठ है जानि लेहु रे मीत ॥ बिनस जाण वाली हरेक वसतू झूठ है। सदीव रहिण वाला अकाल ही खसम है। विचारन वाली गल है के जे सच सबना का खसम है तां की केवल पोथी विच ही जां पोथी ही सच है? पोथी दी रचना तों पहिलां कोई सच नहीं सी?
किरपा करे जिसु पारब्रहमु होवै साधू संगु॥ जिउ जिउ ओहु वधाईऐ तिउ तिउ हरि सिउ रंगु॥ दुहा सिरिआ का खसमु आपि अवरु न दूजा थाउ॥सतिगुर तुठै पाइआ नानक सचा नाउ॥ – पारब्रहम नूं खसम कहिआ है गुरमति ने। अखौती विदवानां नूं ब्रहम, ब्रहमा, पूरनब्रहम ते पारब्रहम दा ही पता नहीं ते सुणी सुणाई गल करदे हन। "पारब्रहम सतिगुर आदेसु॥ मनु तनु तेरा सभु तेरा देसु॥ चूका पड़दा तां नदरी आइआ॥ खसमु तूहै सभना के राइआ॥२॥
मै मनि तनि प्रभू धिआइआ॥ जीइ इछिअड़ा फलु पाइआ॥ साह पातिसाह सिरि खसमु तूं जपि नानक जीवै नाउ जीउ॥ – नानक पातिस़ाह प्रभु नूं खसम आख रहे हन। प्रभ वसदा है घट विच। प्रभ बारे जानण लई वेखो "प्रभ। "हुकमु पइआ धुरि खसम का अती हू धका खाइ॥ गुरमुख सिउ मनमुखु अड़ै डुबै हकि निआइ॥ दुहा सिरिआ आपे खसमु वेखै करि विउपाइ॥नानक एवै जाणीऐ सभ किछु तिसहि रजाइ॥ – जिहड़े दसम बाणी दा विरोध करन वाले गुरू ग्रंथ साहिब नूं खसम आखदे हन ते दसम बाणी नूं मंनण वाले नूं दो खसम मंनण वाला आखदे हन उह आप ही उस दुबिधा विच फसे होए हन। अकाल/हरि/प्रभ दे इलावा भावें गुरू ग्रंथ साहिब नूं खसम आखदे हन इह वी दूजा खसम मंनणा ही है। इक पासे पोथी नूं गुरू ग्रंथ साहिब ते खसम वी आख रहे ने ते दूजे पासे इह वी पड़्ह रहे हन के "गुर मिलि अपुना खसमु धिआवउ॥, जां ता इसनूं मंनो जां फेर पोथी नूं खसम आखो। बाणी आप नहीं विचारी ते दोस़ दूजिआं नूं दिंदे हन। जिसनूं खसम प्रभ मिल जादां है उह मुकत हो जांदा है विकारां तों "दुहा सिरिआ का खसमु प्रभु सोई॥ जिसु मेले नानक सो मुकता होई॥ दसो कौण दाअवा करदा है मुकत होण दा ते खसम प्रापती दा? जे पोथी खसम है तां जिहड़े गुरू घर जा रहे ने सारे ही मुकत होणे चाहीदे सी। "गुरि मिलिऐ खसमु पछाणीऐ कहु नानक मोख दुआरु ॥। "गुर पीर मिलि खुदि खसमु पछाना ॥
हउ ढाढी हरि प्रभ खसम का हरि कै दरि आइआ॥ हरि अंदरि सुणी पूकार ढाढी मुखि लाइआ॥ हरि पुछिआ ढाढी सदि कै कितु अरथि तूं आइआ॥ नित देवहु दानु दइआल प्रभ हरि नामु धिआइआ॥ हरि दातै हरि नामु जपाइआ नानकु पैनाइआ॥, हरि नूं खसम कहिआ जा रहिआ है "हरि सभना का है खसमु सो भगत जन चिति करि ॥
इह पता नहीं खसम पोथी नूं किवें मंन रहे हन, गुरबतणी दा फुरमान है "इतु संगति नाही मरणा॥ हुकमु पछाणि ता खसमै मिलणा॥ – हुकम पछाण, समझ बूझ के खसम नूं मिलणा है। "नानक हुकमु पछाणि कै तउ खसमै मिलणा ॥, "सभ छडाई खसमि आपि हरि जपि भई ठरूरे ॥, हरि ही ठाकुर है, हरि ही अकाल मूरत है ते हुकम पछाण के ही हरि /खसम दी प्रापती होणी है। जिहड़े दसम बाणी दा विरोध करदे हन उह समझण के दसम बाणी विच अकाल दे गुण ते उसे खसम अकाल दी ही सिफ़त कीती गई है।
साहिबु मेरा सदा है दिसै सबदु कमाइ॥ ओहु अउहाणी कदे नाहि ना आवै ना जाइ॥ सदा सदा सो सेवीऐ जो सभ महि रहै समाइ॥ अवरु दूजा किउ सेवीऐ जंमै तै मरि जाइ॥ निहफलु तिन का जीविआ जि खसमु न जाणहि आपणा अवरी कउ चितु लाइ॥ नानक एव न जापई करता केती देइ सजाइ॥
सहजि संतोखि सदा त्रिपतासे अनदु खसम कै भाणै जीउ ॥ – खसम नूं जो भाउणा उस नूं समझ के ही आनंद प्रापत होणा। नहीं तां उसी खसम दी रजा विच "हुकमु पइआ धुरि खसम का अती हू धका खाइ ॥
खसम तां घट अंदर ही बैठा है। खसम/हरि/ठाकुर/राम/बीठल सब घट घट विच जोत सरूप वरत रहे हन "तू करता पुरखु अगंमु है किसु नालि तू वड़ीऐ॥ तुधु जेवडु होइ सु आखीऐ तुधु जेहा तूहै पड़ीऐ॥ तू घटि घटि इकु वरतदा गुरमुखि परगड़ीऐ॥ तू सचा सभस दा खसमु है सभ दू तू चड़ीऐ॥ तू करहि सु सचे होइसी ता काइतु कड़ीऐ॥३॥, अगिआनी बाहर लभदे हन। खसम नूं भाहर लभण वाले भरम विच हन "सभ किछु घर महि बाहरि नाही॥ बाहरि टोलै सो भरमि भुलाही॥
पंचम पातिस़ाह आखदे हन के जन नानक दा खसम वडा है "भगत जनां का राखा हरि आपि है किआ पापी करीऐ॥ गुमानु करहि मूड़ गुमानीआ विसु खाधी मरीऐ॥ आइ लगे नी दिह थोड़ड़े जिउ पका खेतु लुणीऐ॥ जेहे करम कमावदे तेवेहो भणीऐ॥ जन नानक का खसमु वडा है सभना दा धणीऐ॥ ते वडे बारे वेखो गुरबाणी विच की लिखिआ।
खसम कबीर जी वेले वी सी, आखदे "जो जन लेहि खसम का नाउ॥ तिन कै सद बलिहारै जाउ॥ अते भगत नामदेव जी आखदे हन " भगति करउ हरि के गुन गावउ॥ आठ पहर अपना खसमु धिआवउ॥३॥ ", भगत धंनां जी खसम बारे आखदे हन "जननी केरे उदर उदक महि पिंडु कीआ दस दुआरा॥ देइ अहारु अगनि महि राखै ऐसा खसमु हमारा॥, उथे दसो किहड़ी पोथी मौजूद सी जिसनूं विदवान खसम आखदे हन?
बिअंत उदाहरण हन जिंनां नाल खसम सपस़ट पता लगदा है के कौण है। विदवानां ने स़ाइद गुरमति विचारी नहीं। कुझ होर उदाहरण
"जो जन लेहि खसम का नाउ॥ तिन कै सद बलिहारै जाउ॥
जे को नाउ धराए वडा साद करे मनि भाणे॥ खसमै नदरी कीड़ा आवै जेते चुगै दाणे॥ मरि मरि जीवै ता किछु पाए नानक नामु वखाणे॥
धुरि खसमै का हुकमु पइआ विणु सतिगुर चेतिआ न जाइ॥ सतिगुरि मिलिऐ अंतरि रवि रहिआ सदा रहिआ लिव लाइ॥ दमि दमि सदा समालदा दंमु न बिरथा जाइ॥ जनम मरन का भउ गइआ जीवन पदवी पाइ॥ नानक इहु मरतबा तिस नो देइ जिस नो किरपा करे रजाइ॥
अंतरजामी करणैहारा सोई खसमु हमारा॥ निरभउ भए गुर चरणी लागे इक राम नाम आधारा॥२॥ सफल दरसनु अकाल मूरति प्रभु है भी होवनहारा॥ कंठि लगाइ अपुने जन राखे अपुनी प्रीति पिआरा॥३॥
खुदि खसम खलक जहान अलह मिहरवान खुदाइ॥दिनसु रैणि जि तुधु अराधे सो किउ दोजकि जाइ॥२॥
नानक सोहागणि का किआ चिहनु है अंदरि सचु मुखु उजला खसमै माहि समाइ ॥१॥ – जे खसम पोथी है तां ससो किवें समाउणा?
वाहु खसम तू वाहु जिनि रचि रचना हम कीए॥ सागर लहरि समुंद सर वेलि वरस वराहु॥ आपि खड़ोवहि आपि करि आपीणै आपाहु॥ गुरमुखि सेवा थाइ पवै उनमनि ततु कमाहु॥ मसकति लहहु मजूरीआ मंगि मंगि खसम दराहु॥ नानक पुर दर वेपरवाह तउ दरि ऊणा नाहि को सचा वेपरवाहु॥१॥
बरनि न साकउ जैसा तू है साचे अलख अपारा॥ अतुल अथाह अडोल सुआमी नानक खसमु हमारा॥ – मैं तेरा वरणन नहीं कर सकदा तुं अथाह है, अडोल है, अलख, अपार, बिअंत है।
सरब निरंतरि खसमु एको रवि रहिआ॥गुरपरसादी सचु सचो सचु लहिआ॥ दइआ करहु दइआल अपणी सिफति देहु॥ दरसनु देखि निहाल नानक प्रीति एह॥
कबीर जी अकाल नूं खसम कहि रहे हन "कालु अकालु खसम का कीन॑ा इहु परपंचु बधावनु ॥
किथहु उपजै कह रहै कह माहि समावै॥ जीअ जंत सभि खसम के कउणु कीमति पावै॥ कहनि धिआइनि सुणनि नित से भगत सुहावै॥ अगमु अगोचरु साहिबो दूसरु लवै न लावै॥ सचु पूरै गुरि उपदेसिआ नानकु सुणावै॥
धुरहु खसमि भेजिआ सचै हुकमि पठाइ॥ इंदु वरसै दइआ करि गूड़॑ी छहबर लाइ॥
नानक हुकमु वरतै खसम का मति भवी फिरहि चल चित॥ मनमुख सउ करि दोसती सुख कि पुछहि मित॥ गुरमुख सउ करि दोसती सतिगुर सउ लाइ चितु॥ जंमण मरण का मूलु कटीऐ तां सुखु होवी मित॥
साडा तां खसम इको ही है जो भगतां दा ते गुरूआं दा है। जिस बारे पोथी साहिब अते दसम बाणी दोवें समझा रहे हन। बाकी विदवान आपणा वेख लैण के खसम कौण है।
कुझ विदवान पिओ जां पिता जा बाप दो रखण दी गल करदे हन। बाप वी खसम वांग इको ही है, उही अकाल जिस दे गुण पोथी साहिब अते दसम ग्रंथ समझा रहे हन। हुण तक समझ लग जाणी चाहीदी है पर फेर वी उदाहरण पेस़ हन
हउ माणु ताणु करउ तेरा हउ जानउ आपा॥ सभ ही मधि सभहि ते बाहरि बेमुहताज बापा॥२॥ पिता हउ जानउ नाही तेरी कवन जुगता॥बंधन मुकतु संतहु मेरी राखै ममता॥३॥ भए किरपाल ठाकुर रहिओ आवण जाणा॥ गुर मिलि नानक पारब्रहमु पछाणा॥
"ओअं साध सतिगुर नमसकारं॥ आदि मधि अंति निरंकारं॥ आपहि सुंन आपहि सुख आसन॥ आपहि सुनत आप ही जासन॥ आपन आपु आपहि उपाइओ॥ आपहि बाप आप ही माइओ॥ आपहि सूखम आपहि असथूला॥ लखी न जाई नानक लीला॥१॥ करि किरपा प्रभ दीन दइआला॥ तेरे संतन की मनु होइ रवाला॥
कबीर जी आखदे हन "हउ पूतु तेरा तूं बापु मेरा॥ एकै ठाहर दुहा बसेरा॥ कहु कबीर जनि एको बूझिआ॥ गुर प्रसादि मै सभु किछु सूझिआ॥
करि किरपा हसत प्रभि दीने जगत उधार नव खंड प्रताप॥ दुख बिनसे सुख अनद प्रवेसा त्रिसन बुझी मन तन सचु ध्राप॥१॥ अनाथ को नाथु सरणि समरथा सगल स्रिसटि को माई बापु॥ भगति वछल भै भंजन सुआमी गुण गावत नानक आलाप॥
भगत नाम देव जी वी अकाल बारे लिखदे हन "मेरो बापु माधउ तू धनु केसौ सांवलीओ बीठुलाइ॥१॥ रहाउ॥ कर धरे चक्र बैकुंठ ते आए गज हसती के प्रान उधारीअले॥ दुहसासन की सभा द्रोपती अंबर लेत उबारीअले॥१॥ गोतम नारि अहलिआ तारी पावन केतक तारीअले॥ ऐसा अधमु अजाति नामदेउ तउ सरनागति आईअले॥
तुझ ते बाहरि कोई नाहि॥१॥ हरि सुखदाता मेरे मन जापु॥ हउ तुधु सालाही तू मेरा हरि प्रभु बापु॥१॥ रहाउ॥ जह जह देखा तह हरि प्रभु सोइ॥ सभ तेरै वसि दूजा अवरु न कोइ॥२॥ – गुरू साहिब तां हरि नूं बाप कहि रहे ने ते आखदे हन मैं जिथे वेखदा हां तूं ही दिसदा है। अते "सचु परमेसरु नित नवा॥ गुर किरपा ते नित चवा॥ प्रभ रखवाले माई बाप॥ जा कै सिमरणि नही संताप॥
संसारु समुंदे तारि गुोबिंदे॥ तारि लै बाप बीठुला॥
आपु तिआगि संत चरन लागि मनु पवितु जाहि पाप॥१॥ नानकु बारिकु कछू न जानै राखन कउ प्रभु माई बाप॥
पिता कौण?
हउ माणु ताणु करउ तेरा हउ जानउ आपा॥ सभ ही मधि सभहि ते बाहरि बेमुहताज बापा॥२॥ पिता हउ जानउ नाही तेरी कवन जुगता॥बंधन मुकतु संतहु मेरी राखै ममता॥३॥ भए किरपाल ठाकुर रहिओ आवण जाणा॥ गुर मिलि नानक पारब्रहमु पछाणा॥
माता मति पिता संतोखु॥
मेरै हरि प्रभि लेखु लिखाइआ धुरि मसतकि पूरा॥ हरि हरि नामु धिआइआ भेटिआ गुरु सूरा॥ मेरा पिता माता हरि नामु है हरि बंधपु बीरा॥ हरि हरि बखसि मिलाइ प्रभ जनु नानकु कीरा॥
इहनां ने अरदास रद कर दिती, जे पड़्हदे हुंदे विचारदे हुंदे तां स़ाइद समझ आउणी सी के "तू ठाकुरु तुम पहि अरदासि॥ जीउ पिंडु सभु तेरी रासि॥ तुम मात पिता हम बारिक तेरे॥ तुमरी क्रिपा महि सूख घनेरे॥ कोइ न जानै तुमरा अंतु॥ ऊचे ते ऊचा भगवंत॥ सगल समग्री तुमरै सूत्रि धारी॥ तुम ते होइ सु आगिआकारी॥ तुमरी गति मिति तुम ही जानी॥ नानक दास सदा कुरबानी॥
कबीर जी आखदे हन "पिता हमारो वड गोसाई॥ तिसु पिता पहि हउ किउ करि जाई॥ सतिगुर मिले त मारगु दिखाइआ॥ जगत पिता मेरै मनि भाइआ॥
एकु पिता एकस के हम बारिक तू मेरा गुर हाई॥ सुणि मीता जीउ हमारा बलि बलि जासी हरि दरसनु देहु दिखाई॥
मेरा मात पिता हरि राइआ॥करि किरपा प्रतिपालण लागा करंी तेरा कराइआ॥ – गुरबाणी विच हरि कौण है इह समझे बिनां झगड़ा करदे ने कई विदवान।
सो पतिवंता सो धनवंता॥ जिसु मनि वसिआ हरि भगवंता॥ मात पिता सुत बंधप भाई जिनि इह स्रिसटि उपाई हे॥
प्रेम भगति परवाह प्रीति पुबली न हुटइ॥ सतिगुर सबदु अथाहु अमिअ धारा रसु गुटइ॥ मति माता संतोखु पिता सरि सहज समायउ॥ आजोनी संभविअउ जगतु गुर बचनि तरायउ॥ अबिगत अगोचरु अपरपरु मनि गुरसबदु वसाइअउ॥
जिसदा अंदर मन निरमल नहीं होइआ, विकारां विच ग्रसत है, मन विच कपट ते दसम पातिस़ाह ते उहनां दी बाणी लई कपट है उस लई झगड़ा करना सौखा है। जिस दा निसचा गुरमति ते होवे उह कदे नहीं डोलदा। बाणी दी सहिज विचार करदा है। सो भाई बाणी नूं समझो। बाणी हउमै, मोह, भरम, भै ते बाकी विकारां दी मल नूं धो के निरमल करदी है। जे कोई स़ंका होवे बाणी तों खोज लवो। बाणी नूं मंनणा नहीं बाणी दे कहे उपदेस़ नूं मंनणा है। खसम साडा इको ही रहिणा पर उसदा गिआन इक तों जिआदा ग्रंथ विच हो सकदा है।

Source: ਖਸਮ, ਪਿਤਾ, ਪਿਓ ਜਾਂ ਬਾਪ ਕੌਣ?