
Source: ਵੇਦ, ਕਤੇਬ, ਗ੍ਰੰਥ, ਪੋਥੀ ਅਤੇ ਰਚਨਾ
जदों गुरमति दी गल आउंदी है, गुरू ग्रंथ साहिब जी दी गल आउंदी है तां सिख बहुत ही भावुक है। सिख दा प्रेम गुरू ग्रंथ साहिब जी नाल उदां ही है जिवें इक बचे दा आपणे मां पिउ नाल हुंदा है। इह बहुत चंगी गल है। सानूं आपणे गुरू नाल प्रेम होणा गुरू ते माण होणा ज़रूरी है किउं के इह सानूं ना केवल गिआन ते सोझी बख़स़दे हन बल के सानूं भगतां, गुरू साहिबान, भट साहिबान दी मौजूदगी दा अहिसास वी कराउंदे हन। सिख नूं आपणी अधिआतमिक सिखिआ, नाम (सोझी) ते धरम दी सिखिआ गुरू तों प्रापत हुंदी है। सिख आपणे गुरू नूं लैके कई वार भावुक वी हो जांदा है जो उसदी आसथा दा प्रतीक वी है। कई वार इसी आसथा विच असीं गुरू दा उपदेस़ भुल वी जांदे हां। सानूं इह अहिसास होणा के सिखिआ गुरू तों लैणी है ठीक है पर इसे आसथा विच इह नहीं भुलणा के गुरू वेद (बेद), कतेब, दूजे ग्रंथां, ते धारमिक रचनावां बारे की समझाउंदे हन। इस लेख विच असीं इही विचार करांगे के सानूं गुरू दी सिखिआ लैंदे होए दूजे धरम ग्रंथां नूं किवे वेखणा है।
गुरबाणी दा फुरमान है "सरब धरम महि स्रेसट धरमु॥ हरि को नामु जपि निरमल करमु॥ सगल क्रिआ महि ऊतम किरिआ॥ साधसंगि दुरमति मलु हिरिआ॥(रागु गउड़ी, म ५, २६६) – इस तों भाव है के हरि दा नाम (सोझी) प्रापत करना ही जीव दा धरम है। नाम बारे समझण लई वेखो "नाम, जप अते नाम द्रिड़्ह किवें हुंदा?। गिआन लैणा ही सब तों वडा धरम है। धरम बारे विसथार विच जानण लई वेखो "धरम। गुरबाणी दा उपदेस़ है "वेदा महि नामु उतमु सो सुणहि नाही फिरहि जिउ बेतालिआ॥ कहै नानकु जिन सचु तजिआ कूड़े लागे तिनी जनमु जूऐ हारिआ॥(रागु रामकली, म ३, ९१९) – हुण इसदा सिधा अरथ है के उतम नाम (सोझी) वेदां विच वी है पर असीं ना सुण के बेताले फिरदे हां। "पूरन पुरख अचुत अबिनासी जसु वेद पुराणी गाइआ ॥। जिसने सच नूं तज (छड) दिता उह कूड़ भाव विकारां मगर लग के जनम दा जूआ हार गए। आपणी आसथा विच असीं दूजे नूं माड़ा नहीं आखणा। नानक पातिस़ाह जी आखदे हन "केतीआ खाणी केतीआ बाणी केते पात नरिंद॥ केतीआ सुरती सेवक केते नानक अंतु न अंतु॥ – अनेकां स़्रेणीआं हन जीवां दीआं, अनेकां बाणीआं (भास़ावां) हन ते नरिंद (अकाल/मूल/प्रभ/परमेसर/रब) तक पहुंचण दे अनेक राह हन। सो किसे वी धारमिक ग्रंथ नूं असीं नीचा नहीं समझ सकदे। गिआन तां पूरी स्रिसटी विच पिआ है, इस गल नूं ही गुरू समझाउण दी कोस़िस़ करदे हन के जिथों वी गिआन मिले लै लवो। गुणां दी विचार तां सारे धरमां ने कीती है। भरे पए ने अनेकां ग्रंथ, पोथीआं, वेद, कतेब गुणां दी विचार नाल। जिसदी जितनी समझ सी, लोड़ सी उसने आपणे वलों गुणां दी विचार कीती है। फेर माड़ा किसे नूं किउं आखणा? ऊच नीच दी चिंता छडो। जे किसे विदिआरथी दा विस़ा डाकटरी होवे तां उह इह नहीं आखदा के मैं गणित नहीं पड़्हना। जे किसे नूं इह लगदा है के दूजे धरम ग्रंथ पड़्ह लए तां गुरू ग्रंथ साहिब जी दा माण घटदा है तां उसदा विस़वास गुरू ते कचा है। निंदिआ बारे गुरू दा उपदेस़ है के सिख ने किसे दी निंदिआ नहीं करनी। किसे दे विस़वास दा मज़ाक नहीं बणाउणा।
पराई जो निंदा चुगली नो वेमुखु करि कै भेजिआ ओथै भी मुहु काला दुहा वेमुखा दा कराइआ ॥
ओसु अगै पिछै ढोई नाही जिसु अंदरि निंदा मुहि अंबु पइआ ॥
निंदा करदा पचि मुआ विचि देही भखै ॥
पर निंदा बहु कूड़ु कमावै ॥
तजि कामु क्रोधु अनिंद निंदा प्रभ सरणाई आइआ ॥
निंदक नर काले मुख निंदा जिन॑ गुर की दाति न भाई ॥४॥
निंदकु निंदा करि मलु धोवै ओहु मलभखु माइआधारी ॥
कामु क्रोधु लोभु झूठु निंदा साधू संगि बिसारिओ ॥
परहरि लोभु निंदा कूड़ु तिआगहु सचु गुर बचनी फलु पाही जीउ ॥
निंदा दुसटी ते किनि फलु पाइआ हरणाखस नखहि बिदारे ॥
काम क्रोध लोभ झूठ निंदा इन ते आपि छडावहु ॥
की निंदा साकत की पूजा ऐसी द्रिड़॑ी बिपरीति ॥१॥
पर धन पर तन पर की निंदा इन सिउ प्रीति न लागै ॥
निंदा भली किसै की नाही मनमुख मुगध करंनि ॥
निंदक निंदा करि पचे जमकालि ग्रसीए ॥
काम क्रोध लोभ रतु निंदा सतु संतोखु बिदारन ॥१॥
निंदा करि करि बहुतु विगूता गरभ जोनि महि किरति पइआ ॥
कामु क्रोधु लोभु झूठु निंदा साधू संगि बिदारना ॥३॥
पर धन पर तन पर ती निंदा पर अपबादु न छूटै॥ आवा गवनु होतु है फुनि फुनि इहु परसंगु न तूटै॥
निंदा करि करि नरक निवासी अंतरि आतम जापै ॥
छोडिहु निंदा ताति पराई॥ पड़ि पड़ि दझहि साति न आई॥ मिलि सतसंगति नामु सलाहहु आतम रामु सखाई हे॥
उसतति निंदा दोऊ बिबरजित तजहु मानु अभिमाना ॥
गुरबाणी दा फुरमान है "नामु तेरा सभु कोई लेतु है जेती आवण जाणी॥ जा तुधु भावै ता गुरमुखि बूझै होर मनमुखि फिरै इआणी॥५॥ चारे वेद ब्रहमे कउ दीए पड़ि पड़ि करे वीचारी॥ ता का हुकमु न बूझै बपुड़ा नरकि सुरगि अवतारी॥६॥ जुगह जुगह के राजे कीए गावहि करि अवतारी॥ तिन भी अंतु न पाइआ ता का किआ करि आखि वीचारी॥७॥ तूं सचा तेरा कीआ सभु साचा देहि त साचु वखाणी॥ जा कउ सचु बुझावहि अपणा सहजे नामि समाणी॥ – जदो आखिआ वेद ब्रहमे को दीए तां साडे विदवानां नूं लगदा के ब्रहमा किसे दुजे धरम दा देवता है। गुरबाणी तों ब्रहम की है समझिआ नहीं, गुरबाणी ने ब्रहम जीव दे घट (हिरदे) विच ही वसदा दसिआ है "पूरन ब्रहमु रविआ मन तन महि आन न द्रिसटी आवै ॥, तां इह समझ लगदी है के वेद वी जीव नूं नाम प्रापती लई ही दिते सी। ब्रहम समझण लई वेखो "ब्रहम, ब्रहमा, पारब्रहम, पूरनब्रहम।
वेद दा स़बदी अरथ ही गिआन है। गुरबाणी तां वेद धरम (गिआन धरम) ही द्रिड़ करा रही है। जे किसे सिख दा सिख मरिआदा विच विआह होइआ है तां उसने लावां जे पड़्हीआं, विचारीआं, समझीआं नहीं तां सुणीआं ज़रूर होणीआं "हरि पहिलड़ी लाव परविरती करम द्रिड़ाइआ बलि राम जीउ॥ बाणी ब्रहमा वेदु धरमु द्रिड़हु पाप तजाइआ बलि राम जीउ॥ धरमु द्रिड़हु हरि नामु धिआवहु सिम्रिति नामु द्रिड़ाइआ॥ सतिगुरु गुरु पूरा आराधहु सभि किलविख पाप गवाइआ॥ सहज अनंदु होआ वडभागी मनि हरि हरि मीठा लाइआ॥ – इस विच वेद धरम (गिआन धरम) द्रिड़ करन दी गल कीती जा रही है। नानक पातिस़ाह जी ने जप बाणी विच वी समझाइआ है "गुरमुखि नादं गुरमुखि वेदं गुरमुखि रहिआ समाई॥ – गुणां नूं मुख रखण वाला वेद (गिआन) विच रमिआ हुंदा। "सुणिऐ सासत सिम्रिति वेद॥ नानक भगता सदा विगासु॥ – विगास किवें होणा इह दस रहे हन।
बेदु पुकारे वाचीऐ बाणी ब्रहम बिआसु॥ मुनि जन सेवक साधिका नामि रते गुणतासु॥ सचि रते से जिणि गए हउ सद बलिहारै जासु॥
सिंम्रिति सासत बेद बखाने॥ जोग गिआन सिध सुख जाने॥ नामु जपत प्रभ सिउ मन माने॥३॥
"गुरमुखि गावै गुरमुखि बोलै॥ गुरमुखि तोलि तोुलावै तोलै॥ गुरमुखि आवै जाइ निसंगु॥ परहरि मैलु जलाइ कलंकु॥ गुरमुखि नाद बेद बीचारु॥ गुरमुखि मजनु चजु अचारु॥ गुरमुखि सबदु अंम्रितु है सारु॥ नानक गुरमुखि पावै पारु॥
“कोई नावै तीरथि कोई हज जाइ॥ कोई करै पूजा कोई सिरु निवाइ॥२॥ कोई पड़ै बेद कोई कतेब॥ कोई ओढै नील कोई सुपेद॥३॥ कोई कहै तुरकु कोई कहै हिंदू॥ कोई बाछै भिसतु कोई सुरगिंदू॥४॥ कहु नानक जिनि हुकमु पछाता॥ प्रभ साहिब का तिनि भेदु जाता॥“
“बेद पुरान सिंम्रिति महि देखु॥ ससीअर सूर नखॵत्र महि एकु॥ बाणी प्रभ की सभु को बोलै॥ आपि अडोलु न कबहू डोलै॥ सरब कला करि खेलै खेल॥ मोलि न पाईऐ गुणह अमोल॥ सरब जोति महि जा की जोति॥ धारि रहिओ सुआमी ओति पोति॥ गुर परसादि भरम का नासु॥ नानक तिन महि एहु बिसासु॥३॥ “
"जतु पाहारा धीरजु सुनिआरु॥ अहरणि मति वेदु हथीआरु॥ भउ खला अगनि तप ताउ॥ भांडा भाउ अंम्रितु तितु ढालि॥ घड़ीऐ सबदु सची टकसाल॥ जिन कउ नदरि करमु तिन कार॥ नानक नदरी नदरि निहाल॥३८॥ – जतु = नामु (सोझी "जतु सतु संजमु नामु है विणु नावै निरमलु न होइ॥, जिवें सुनिआर धीरज रखदिआं सट मार के सोना ढालदा है, मत अहरणि = जिस उपर सट मारी जांदी उसे तरां वेद (गिआन) दी सट मारनी। सुनिआर खल दे बणे यंतर नाल हवा करदा अग भभकदी रवे उवें भउ दी खल बणा अग बलदी रखणी मन विच। फेर भाओ दा भांडा गिआन नाल ढालणा है। गुरमति गिआन सबद नाल सची टकसाल घट अंदर बणाउणी है। परमेसर दी नदर जिस ते होवे भाव जिस ते करम होण उसनूं गिआन प्रापत होणा। वेद लिखण वाले विच वी उह अकाल पुरख दी जोत ही वस रही है, विचारन वाले विच वी है "चचै चारि वेद जिनि साजे चारे खाणी चारि जुगा॥ जुगु जुगु जोगी खाणी भोगी पड़िआ पंडितु आपि थीआ॥, हरेक जीव हरेक मुलक दे वसनीक, हरेक जुग विच, पंडितु विच वी , हरेक स़्रेणी विच परमेस़र दी जोत घट विच वसदी है। खोजणा उसने है जिसदे मसतक भाग होण।
"विसमादु नाद विसमादु वेद॥ विसमादु जीअ विसमादु भेद॥ विसमादु रूप विसमादु रंग॥ विसमादु नागे फिरहि जंत॥ विसमादु पउणु विसमादु पाणी॥ विसमादु अगनी खेडहि विडाणी॥ विसमादु धरती विसमादु खाणी॥ विसमादु सादि लगहि पराणी॥ विसमादु संजोगु विसमादु विजोगु॥ विसमादु भुख विसमादु भोगु॥ विसमादु सिफति विसमादु सालाह॥ विसमादु उझड़ विसमादु राह॥ विसमादु नेड़ै विसमादु दूरि॥ विसमादु देखै हाजरा हजूरि॥ वेखि विडाणु रहिआ विसमादु॥ नानक बुझणु पूरै भागि॥"
आपे वेद पुराण सभि सासत आपि कथै आपि भीजै॥ आपे ही बहि पूजे करता आपि परपंचु करीजै॥ आपि परविरति आपि निरविरती आपे अकथु कथीजै॥ आपे पुंनु सभु आपि कराए आपि अलिपतु वरतीजै॥ आपे सुखु दुखु देवै करता आपे बखस करीजै॥
कई कोटि होए पूजारी॥ कई कोटि आचार बिउहारी॥ कई कोटि भए तीरथ वासी॥ कई कोटि बन भ्रमहि उदासी॥ कई कोटि बेद के स्रोते॥ कई कोटि तपीसुर होते॥ कई कोटि आतम धिआनु धारहि॥ कई कोटि कबि काबि बीचारहि॥ कई कोटि नवतन नाम धिआवहि॥ नानक करते का अंतु न पावहि॥१॥
“मिहरवान मउला तूही एक॥ पीर पैकांबर सेख॥ दिला का मालकु करे हाकु॥ कुरान कतेब ते पाकु॥३॥ नाराइण नरहर दइआल॥ रमत राम घट घट आधार॥ बासुदेव बसत सभ ठाइ॥ लीला किछु लखी न जाइ॥“
“रोजा बाग निवाज कतेब विणु बुझे सभ जासी॥ लख चउरासीह मेदनी सभ आवै जासी॥ निहचलु सचु खुदाइ एकु खुदाइ बंदा अबिनासी॥“
वेदां बारे कई पंकतीआं नूं तोड़ मरोड़ के वी पेस़ कीता जांदा है। पर जे सहिज नाल विचार कीती जावे तां समझ लगदा है के "चारे वेद ब्रहमे कउ दीए पड़ि पड़ि करे वीचारी॥ ता का हुकमु न बूझै बपुड़ा नरकि सुरगि अवतारी॥ – कहिआ जा रहिआ है के वेद पड़्ह के वी मनुख हुकम नूं समझदा नहीं ते नरक सुरग दी सोच विच फस जांदा है। इस नूं गुरबाणी ने सपस़ट कीता है। नरक सुरग बारे गुरबाणी जो समझा रही है वेखो "सुरग ते नरक (Swarg te Narak), दोजक। इक होर पंकती है जिस नूं तोड़ मरोड़ के पेस़ कीता जांदा है के जी वेद पड़्ह के वी हर रस नहीं आइआ – "वेदु पड़हि हरि रसु नही आइआ॥वादु वखाणहि मोहे माइआ॥ अगिआनमती सदा अंधिआरा गुरमुखि बूझि हरि गावणिआ॥ – असल विच इस पंकती दा भाव है के जे वेद पड़्ह के वी हर रस नहीं आइआ ते जे वाद विवाद विच फस गिआ तां अगिआन वाली मती विच अंधिआरा (हनेरा) ही रहिणा पर गुणां नूं मुख रखण वाले ने हरि दे गिण गाउणे हन। इही आदेस़ तां गुरबाणी पड़्हन वाले सिंखां नूं वी दिता है के "गुरमति सुनि कछु गिआनु न उपजिओ पसु जिउ उदरु भरउ॥ कहु नानक प्रभ बिरदु पछानउ तब हउ पतित तरउ॥। अज सिखां ते वी इह लागू है, गुरबाणी पड़्ह के वी हरि रस बारे नहीं पता, हरि कौण है, किथे वसदा, हरि रस है की इह अज दा सिख कोई विरला ही जाणदा है। हरि बारे गुरमति विचार लई वेखो "हरि। असीं गुरबाणी नूं पड़्ह रहे हां, सुण रहे हां, गा रहे हां पर की सानूं समझ लग रही है के गुरबाणी समझा की रही है? जिवें बेद पड़्हन वाले जे नां विचारन उहनां नूं कहिआ "चतुर बेद मुख बचनी उचरै आगै महलु न पाईऐ॥ बूझै नाही एकु सुधाखरु ओहु सगली झाख झखाईऐ॥३॥", किते गुरबाणी पड़्हन वाले वी "आवन आए स्रिसटि महि बिनु बूझे पसु ढोर॥ तां नहीं बण रहे, "पड़ि पड़ि गडी लदीअहि पड़ि पड़ि भरीअहि साथ॥ पड़ि पड़ि बेड़ी पाईऐ पड़ि पड़ि गडीअहि खात॥ साडे ते लागू तां नहीं हो रहिआ? वेद वी इदां ही किसे लई सांकल जेवरी तां नहीं बण गए सी? "बेद की पुत्री सिंम्रिति भाई॥ सांकल जेवरी लै है आई॥१॥ आपन नगरु आप ते बाधिआ॥ मोह कै फाधि काल सरु सांधिआ॥ – इहनां पंकतीआं नूं समझण दी लोड़ है। सिंम्रितीआं वेदां विचों निकलीआं, वेदां नूं रटण दा कंम पहिलां वी होइआ है। कुझ धारमिक लोकां नूं इह लगिआ के लोकां नूं वेद समझणे औखे हन, जिवें टीके लिखे गए ठीक वैसे ही सिम्रितीआं लिखिआं गईआं। विचार के गिआन लैण दी थां रटणा स़ुरू कर दिता गिआ, मंत्र उचारन मातर रहि गिआ। फेर इक समां आइआ जदों वेद लभणे आम मनुख लई मुस़कल हो गए। केवल धारमिक आगू ही जो आपणी मरज़ी अते समझ नाल समझाउण लग पए उही लोक मंनण लग पए। इह सोचण वाली गल है के किते इही साकल जेवरी अज सिख तां नहीं पाउण लग पए जिवें "बंधन बेदु बादु अहंकार॥ बंधनि बिनसै मोह विकार॥ – जदों गिआन बंधन बण जावे, अहंकार वल लै जावे उदों सोचण दी विचारन दी लोड़ है। बाणी आप पड़्ह के विचारन, समझण दी थां किते इक क्रिआ बण के तां नहीं रहि गिआ बाणी पड़्हना? कई वार लोकां नूं भरम होइआ ते भगतां नाल वाद विवाद वी कीता उहनां नूं जवाब दिता गिआ "हम घरि सूतु तनहि नित ताना कंठि जनेऊ तुमारे॥ तुम॑ तउ बेद पड़हु गाइत्री गोबिंदु रिदै हमारे॥।
परमेसर तां सारिआं विच वसदा भावें किई बोले राम राम, कोई खुदाए, कोई गिसाईं सेवै जां कोई अलाह नूं मंने "कई कोटि राजस तामस सातक॥ कई कोटि बेद पुरान सिम्रिति अरु सासत॥ कई कोटि कीए रतन समुद॥ कई कोटि नाना प्रकार जंत॥ कई कोटि कीए चिर जीवे॥ कई कोटि गिरी मेर सुवरन थीवे॥ कई कोटि जखॵ किंनर पिसाच॥ कई कोटि भूत प्रेत सूकर म्रिगाच॥ सभ ते नेरै सभहू ते दूरि॥ नानक आपि अलिपतु रहिआ भरपूरि॥४॥। सारे ही जंत सारे ही ग्रंथ, सारी रचना उस इको अकाल ने बणाई जिसदे नाम सारी दुनीआं दे लोक लै रहे ने। जे कोई इक परीवार दा बचे कहिण पापा कहिणा वधीआ है, दूजा कहे डैडी कहिणा ठीक है, कोई कहे जी जे अबा ना कहिआ तां काफ़िर है, कोई कहे पिता कहिणा सब तों स्रेस़ट है, अज इनसान वी इही झगड़ा कर रहे ने अगिआनता विच। नाम (सोझी/सुरत) ने ही सारी रचना बणाई है – "नाम के धारे सगले जंत॥ नाम के धारे खंड ब्रहमंड॥ नाम के धारे सिम्रिति बेद पुरान॥ नाम के धारे सुनन गिआन धिआन॥ नाम के धारे आगास पाताल॥ नाम के धारे सगल आकार॥ नाम के धारे पुरीआ सभ भवन॥ नाम कै संगि उधरे सुनि स्रवन॥ करि किरपा जिसु आपनै नामि लाए॥ नानक चउथे पद महि सो जनु गति पाए॥५॥
गुरमति ने गुणां दी मति फेर उजागर कीती। भगत बाणी, गुरू साहिबान दे बचन, भट बाणी, दसम बाणी सानूं मुड़ परमेसर तक पहुंचण दा मारग दस रहे हन। गिआन विचार निरंतर चल रही है। जदों तों मनुख दा धरती ते आगमन होइआ है मनुख दे जीवन विच सरीर लई जिवें भोजन चाहीदा, मन दा भोजन गिआन परमेसर तों आप मिलदा रहिआ है। इस गिआन विच हमेस़ा वाधा हुंदा रहिआ है। जे वेदां विच कोई विस़ा रहि वी गिआ सी तां गुरूआं ने भगतां ने उस विच सुधार ही कीता है, इस सुधार नाल वेद जां कतेब छोटे जां घट नहीं हो जांदे। कई वार सानूं वी इह अहंकार हो जांदा है के सानूं गुरू साहिब ने कितना बड़ा गिआन दा खजाना बखस़िआ है, पर इस अहंकार नूं रोकण लई नाल इह वी कहि दिता के "बेद कतेब कहहु मत झूठे झूठा जो न बिचारै॥, वेदां नूं घट कां छोटा नहीं कहिणा, झूठा उह है जो विचार नहीं करदा, जिसदा हिरदा स़ुध नहीं है, जो अहंकार विच फसिआ है। गुरमुख तां हरेक गिआन दे ग्रंथ नूं, कतेब नूं, पोथी नूं, रचना नूं प्रेम नाल मथे ते लाउंदा है, गिआन देण वाली हरेक लिखत नूं चुंमदा है, पड़्ह के हिरदे विच वसाउंदा है। प्रेम ही वधाउंदा है। "वाचै वादु न बेदु बीचारै॥ आपि डुबै किउ पितरा तारै॥ घटि घटि ब्रहमु चीनै जनु कोइ॥ सतिगुरु मिलै त सोझी होइ॥।
बेद सासत्र जन धिआवहि तरण कउ संसारु॥ करम धरम अनेक किरिआ सभ ऊपरि नामु अचारु॥ – महाराज आखदे कई जन हन जो बेद सासत्र ते अज सिखां ते वी लागू है जो ग्रंथ पड़्ह रहे हन, किस लई? तरन लई, अनेक तरीके दे करम धरम कर रहे हन पर अहंकार छडे बिनां। नाम (सोझी) वाले आचरण सब तों उपर है।
जदों अरदास विच पड़्हदे हां के "पांइ गहे जब ते तुमरे तब ते कोऊ आंख तरे नहीं आन्यो॥ राम रहीम पुरान कुरान अनेक कहैं मत एक न मान्यो॥ सिंम्रित सासत्र बेद सभै बहु भेद कहैं हम एक न जान्यो॥ स्री असिपान क्रिपा तुमरी करि मै न कह्यो सभ तोहि बखान्यो॥ तां वी इही समझाइआ जा रहिआ है के इह सारे वी तुहाडी किरपा तुहाडे बखान नाल रचे गए ने। अगे जा के दसम पातिस़ाह कलीअर करदे हन "बेद कतेब न भेद लहयो तिहि सिध समाधि सबै करि हारे॥ सिंम्रित सासत्र बेद सबै बहु भाति पुरान बीचार बीचारे॥ आदि अनादि अगाधि कथा ध्रूअ से प्रहिलादि अजामल तारे॥ नामु उचार तरी गनिका सोई नामु अधार बीचार हमारे॥ – बेद कतेब दा भेद नहीं लहिआ, सिध समाध सारे कर के हार गए। सिंम्रित सासतर बेद बीचार कर लई, अनादि अगाधि कथा है तेरी जिहड़ा तूं ध्रूअ वरगे प्रहिलाद ते अजामल तार दिते। नाम नूं उचार के जिवें गनिका तरी उही नाम (सोझी) मेरा आधार ते बीचार हन। वेदां नूं माड़ा किसे गुरू ने नहीं कहिआ है।
केते कहहि वखाण कहि कहि जावणा॥ वेद कहहि वखिआण अंतु न पावणा॥पड़िऐ नाही भेदु बुझिऐ पावणा॥ खटु दरसन कै भेखि किसै सचि समावणा॥ सचा पुरखु अलखु सबदि सुहावणा॥ मंने नाउ बिसंख दरगह पावणा॥ खालक कउ आदेसु ढाढी गावणा॥ नानक जुगु जुगु एकु मंनि वसावणा॥, "बेद पड़े पड़ि ब्रहमे हारे इकु तिलु नही कीमति पाई ॥ – आखदे वेद वखिआण करदे हन पर केवल पड़्हन नाल गल नहीं बणदी जो लिखिआ इह बूझणा पैणा, विचारना पैणा। इह गुरू ग्रंथ साहिब जी, स्री दसम ग्रंथ अते होर धारमिक ग्रंथां ते वी लागू हुंदा है। "पतित उधारणा जीअ जंत तारणा बेद उचार नही अंतु पाइओ ॥ – केवल उचारन नाल नहीं अंत पाइआ जाणा, समझणा, बूझना ते विचारना पैणा। जे इह गल के "बेद कतेब सिम्रिति सभि सासत इन॑ पड़िआ मुकति न होई॥ एकु अखरु जो गुरमुखि जापै तिस की निरमल सोई॥३॥ तां गुरमुख (गुणां नूं मुख) रखण वाले नूं वी गिआन वीचार करे बिनां नाम (सोझी) दी प्रापती नहीं होणी। गिआन दा दीवा घट विच बालणा पैणा "दीवा बलै अंधेरा जाइ॥ बेद पाठ मति पापा खाइ॥ उगवै सूरु न जापै चंदु॥ जह गिआन प्रगासु अगिआनु मिटंतु॥ बेद पाठ संसार की कार॥ पड़ि॑ पड़ि॑ पंडित करहि बीचार॥ बिनु बूझे सभ होइ खुआर॥ नानक गुरमुखि उतरसि पारि॥१॥। भावें कोई बेद पड़्हे, कोई कतेब पड़्हे, गुरबाणी पड़्हे जां कोई वी होर ग्रंथ, गुणां दी विचार ते गिआन नूं बुध विच दाखल कीते बिनां कोई लाभ नहीं। "सभि नाद बेद गुरबाणी॥ मनु राता सारिगपाणी॥ तह तीरथ वरत तप सारे॥ गुर मिलिआ हरि निसतारे॥३॥ जह आपु गइआ भउ भागा॥ गुर चरणी सेवकु लागा॥ गुरि सतिगुरि भरमु चुकाइआ॥ कहु नानक सबदि मिलाइआ॥
जदों वेद कतेब सारे ही रब दी सिफ़त कर रहे ने आपणे ढंग नाल "हउ अनदिनु नामु लई करतारे॥ जिनि सेवक भगत सभे निसतारे॥ दस अठ चारि वेद सभि पूछहु जन नानक नामु छडाई जीउ॥ ते गुरमति दा फुरमान है "हिंदू तुरक का साहिबु एक॥ कह करै मुलां कह करै सेख॥ तां फेर सपस़ट है के असीं अहंकार विच आपणे आप नूं वडा ते क्रोध विच दूजे नूं घट समझ रहे हां। अगिआनता वस झगड़ा पा के असीं बैठे हां जे असीं गुरमति समझी होवे, अगलिआं ने आपणे ग्रंथ, वेद कतेब पड़्हे होण रल के प्रेम नाल विचार होवे तां झगड़े मुक जाण। जिहड़ा बिना पड़्हे बिनां वाचे झगड़ा करदा है उसदे बारे वी दसिआ है "वेदु पड़ै अनदिनु वाद समाले॥ नामु न चेतै बधा जमकाले॥ दूजै भाइ सदा दुखु पाए त्रै गुण भरमि भुलाइदा॥, समझण दी लोड़ है के इह अज साडे ते वी लागू है। "जिनि हरि सेविआ तिनि सुखु पाइआ॥ सहजे ही हरि नामि समाइआ॥ जो सरणि परै तिस की पति राखै जाइ पूछहु वेद पुराणी हे॥
कई वार वेद, कतेब, ग्रंथ, पोथी पड़्ह के गिआन दा अहंकार वी हो जांदा है। त्रै गुण माइआ विच वी मनुख फस जांदा है "पड़े रे सगल बेद नह चूकै मन भेद इकु खिनु न धीरहि मेरे घर के पंचा॥ कोई ऐसो रे भगतु जु माइआ ते रहतु इकु अंम्रित नामु मेरै रिदै सिंचा॥३॥", "वेद पड़ै पड़ि वादु वखाणै ब्रहमा बिसनु महेसा॥ एह त्रिगुण माइआ जिनि जगतु भुलाइआ जनम मरण का सहसा॥ गुरपरसादी एको जाणै चूकै मनहु अंदेसा॥ – त्रै गुण माइआ बारे समझण लई वेखो "त्रै गुण माइआ, भरम अते विकार। गिआन लैंदिआं विकारां तों ही बचणा हे, गुणां नूं ही चेते रखणा है। तत गिआन तक पहुंचण लई आपणी बुध तिआगणी है ते नाम (सोझी) गुणां दी मति चेते रखणी है "होवा पंडितु जोतकी वेद पड़ा मुखि चारि॥ नवा खंडा विचि जाणीआ अपने चज वीचार॥३॥ ब्रहमण कैली घातु कंञका अणचारी का धानु॥ फिटक फिटका कोड़ु बदीआ सदा सदा अभिमानु॥ पाहि एते जाहि वीसरि नानका इकु नामु॥ सभ बुधी जालीअहि इकु रहै ततु गिआनु॥, गुरबाणी वाला पंडत उह है जिसने तत पछाण लिआ "ततु पछाणै सो पंडितु होई॥, "सो पंडितु जो मनु परबोधै॥ राम नामु आतम महि सोधै॥ राम नाम सारु रसु पीवै॥ उसु पंडित कै उपदेसि जगु जीवै॥ हरि की कथा हिरदै बसावै॥ सो पंडितु फिरि जोनि न आवै॥ बेद पुरान सिम्रिति बूझै मूल॥ सूखम महि जानै असथूलु॥ चहु वरना कउ दे उपदेसु॥ नानक उसु पंडित कउ सदा अदेसु॥
गुरूआं ने वेदां बारे लिखिआ है के इह सारे वी इको गल करदे हन, गिआन दी, गुणां दी, चंगा समाज सिरजण दी ते पुकार के लोकां नूं एका करन नूं आखदे हन इह तुसीं वी विचार के वेख लवो "सासत बेद सिम्रिति सभि सोधे सभ एका बात पुकारी॥ बिनु गुर मुकति न कोऊ पावै मनि वेखहु करि बीचारी॥२॥।
बेद, कतेब, ग्रंथ, पोथीआं सारिआं विचों परमेसर दे गुणां दा गिआन दरज है। उहनां महांपुरखां दी बाणी दरज है जिहनां लोकां नाल गिआन विचार सांझी कीती है। गुरमति दा फुरमान है के गिआन ही गुरू है ते इह गिआन गुरू पूरी स्रिसटी नूं प्रकास़मान करदा है। "पोथी परमेसर का थानु॥ साधसंगि गावहि गुण गोबिंद पूरन ब्रहम गिआनु॥१॥ – साध उह जिसने मन साध लिआ, जिसदे घट विच विकार लगाम ते हन। मन साधण नाल ही ब्रहन गिआन दी प्रापती होणी ते ग्रंथां विच इह गिआन मारग समझाइआ होइआ है। झगड़े, विकार खतम कर के राह समझ लगणी उस निराकार परमेसर तक पहुंचण दी जो घट विच ही वसदा है।
जदों तक असीं पड़्हन, सुणन, गाइन तक सीमित हां, गुरबाणी नूं पड़्ह के समझ के, विचार के हिरदे विच नहीं वसाउंदे उदों तक आपणे पराए दा फ़रक दिसदा रहिणा। गुरबाणी एके दी मति है। आप समझणा है, दूजिआं नूं वी समझाउणा है। सुहिरद समाज विच होवे तां विकारां दी थां प्रेम भावना वधे। जदों सारिआं विच राम की अंस़, अकाल दी जोत, राम, हरि दी मौजूदगी, अलाह दा नूर दिसू तां झगड़े मुकणे। जदों तक अलाह अरस़ ते, स़िव हिमालिआ ते, राम अयोधिआ विच ते अकाल किते बाहर दिसू उदों तक भेद भाव रहिणा। अलाह हरेक जीव दे घट विच ही बुध दे सब तों उते ॳसथान (अरस़) ते, हिमालिआ घट विच ही बुध विच हेम (ठंडक) दे कुंट भाव जिथे विकारां दी अग ना होवे, अंदर ही घट विच रमिआ होइआ दिसू, अकाल मूरत मन जोत सरूप दिसू तां फेर कोई झगड़ा बचणा ही नहीं। गुरमति इही तां सानूं उपदेस़ दे रही है पर असीं मंनण नूं तिआर नहीं। मंनण वाले दी गति कही नहीं जा सकदी इही तां गुरबाणी आखदी है। सो सारिआं विच एका ही "oneness ही रब है। इही बेनती है जी के गुरबाणी, बेद, कतेब (कुरान) सारिआं विच इको रचनहार दी गल हो रही है समझ के आपसी भेद भाव खतम करीए। अगिआनता विच हरेक इही मंनदा है के मेरा धरम दूजे दे धरम नालों वडा है पवितर है जिस कारण दूजे धरम दे लोकां नूं तसीहे दिंदा है। दूजे नूं मौका मिलदा है उह तसीहे देण लग जांदा है। सारे इही आखदे ने के जदों साडा राज आउणा असीं माड़ा नहीं करना पर तकरीबन हरेक संसारी धरम नूं मंनण वाले मौका आण ते तस़दद करदे हन। गिआन लए बिनां ही आपणे आप नूं उचा ते सुचा मंनदे हन। गिआनी मनुख परमेसर भै विच हुंदा है, एके दी गल करदा है। सुहिरद दी गल करदा है। जिस उते तस़दद होई हुंदी है उस लई माफ़ करना औखा है पर माफ़ करन वाला ही एके वल वध सकदा है। इक दूजे ते तस़दद दा सिलसिला खतम कर के गिआन धरम दे चानणे नाल अगिआनता दे हनेरे नूं सुहिरद दे चानणे विछ बदलिआ जा सकदा है। सुहिरद मनुख दा मूल गुण है। इस लई गिआन विचार करनी ही पैणी। मूल, धन, जान माल दा नुकसान कीते बिनां कर लईए जां सब गवाउण तों बाद करीए इह सोच विचार करनी पैणी।

Source: ਵੇਦ, ਕਤੇਬ, ਗ੍ਰੰਥ, ਪੋਥੀ ਅਤੇ ਰਚਨਾ