
Source: ਸਾਧਨਾ ਅਤੇ ਤਪ (Sadhna and Tap)
गुरबाणी ने सरीर नूं कसट दे के तपाउण नूं तप नहीं मंनिआ। कुझ मतां दे विच सरीर दे तप राहीं परमेसर प्रापती दा मारग दसिआ है। इसनूं साधना करना वी आखदे हन। गुरमति विच मन नूं साधन (काबू) करन दा गिआन राहीं मारग दसिआ है जिथों अगिआनता कारण विकार पैदा हुंदे हन। मन दे गिआन राहीं तप नाल गुणां दी विचार नाल विकार काबू रहिंदे हन अते असीम अडोल सदा रहिण वाले अनंद दी अवसथा बणदी है। अखां बंद करके, चौकड़ा ला के, जंगल पहाड़, बरफ परबत आदी ते जा के बैठ जाण नूं गुरमति तप जां तपसिआ बहीं मंनदी। ना सरीर नूं कस़ट देण नूं आखदी है। आदि बाणी अते दसम बाणी दोहां विच इसदे प्रमाण मिलदे हन।
जप बारे असीं विसथार नाल गल कर चुके हां वेखो
नाम, जप अते नाम द्रिड़्ह किवें हुंदा?
जपणा ते सिमरन करना ? नाम जापण दी गुरमति विधी की है ?
स्री आदि ग्रंथ जी अते स्री दसम ग्रंथ जी समानता
प्रेम किओ न किओ बुहतो तप कसट सहिओ तन को अति तायौ॥ कासी मै जाइ पड़िओ अति ही बहु बेदन को करि सार न आयो॥
जो हरि मंत्र अराधत है तप साधत है मन मै नही आयो॥जग्य कीए बहु दान दीए सब खोजत है किनहूं नही पायो॥
प्रभ नूं पाउण दा मारग दसिआ है "साचु कहों सुन लेहु सभै जिन प्रेम कीओ तिन ही प्रभु पाइओ ॥
प्रेम किओ न किओ बुहतो तप कसट सहिओ तन को अति तायौ॥ – प्रेम ते कीता नही अपणी अंतर आतमा नाल़, बाहर सरीर तन नूं बहुते कसट दिते, बाहर सरीर नूं कसट देण नूं ही बहुत लोक करम धरम मंनदे हन, इह नही पता पारब्रहम प्रमेसर दी प्रापती किवे होवेगी, जिवें आपणा रखिआ ओस दा नाम वी रख लिआ। मंनदे ने कि ओस दा बार बार नाम लैण नाल़ मिल जावे गा, लोक रब नू खिडौणा मंनदे हन ,के ओह वडिआई तौ खुस़ हो के पता नी संसारी पदारथ दे देवेगा ते कीते माड़े कंम चापलूसी कारण भुल जावेगा।
साचु कहों सुन लेहु सभै जिन प्रेम कीओ तिन ही प्रभ पाइओ॥ – उस नूं प्रेम करन तों भाव है उसदे गुणां नूं प्रेम करना ते धारण करना। उसदे हुकम नूं मंनणा। जो सरव विआपी है, बाहर वी है घट अंदर वी है उसनूं आपणे अंदर ही खोजणा। जिवें कबीर जी ने कीता "कबीर जा कउ खोजते पाइओ सोई ठउरु॥ सोई फिरि कै तू भइआ जा कउ कहता अउरु॥
कासी मै जाइ पड़िओ अति ही बहु बेदन को करि सार न आयो॥ – दसम पातसाह ने कासी दी मत नू किवे रद कर रहे हन, जो अज़ तक झूठ ग़ल प्रचारदे रहे के दसम पातसह ने सिख कासी भेजे पड़न लई। हुण तक संगत नूं झूठ बोलदे रहे। सिख प्रचारक "कासी मै जाइ पड़िओ अति ही बहु बेदन को करि सार न आयो॥ साफ दस रहे ने जो वी कासी विच बैठ के बुह बेद पड़न नाल़ सार गिआन न आयो। हुण तक सिखां विच प्रचारक इह ग़ल दा जोर सोर नाल़ प्रचार कर रहे हन दसम पातसह ने सिख कासी भेजे इह ग़ल झूठ है ।
सगल जनमु सिव पुरी गवाइआ॥ – भगत कबीर तां कहि रहे ने के सारा जनम मैं स़िव पुरी (कासी) विच गवा लिआ॥
जगन होम पुंन तप पूजा देह दुखी नित दूख सहै ॥ – इह उदाहरण है गुरबाणी तों के सरीर नूं बस कसट ही दिता जा रहिआ है। इह जग होम तप पूजा नहीं हन। ना ही रब नूं इहनां नाल कोई खुस़ कर सकदा है। कदे मां नाप वी आपणे बचे नूं आपणे तन नूं कस़ट दिंदे वेख के खुस़ होए हन? फेर रब किवें खुस़ हो जाणा। जे जवाक ने गलती कीती होवे, बचा कहे मैं सारा जीवन बांह उते रखांगा तां की बाप खुस़ हो जाणा।
साधना है मन। मन असाध है जिस नूं गुरमति (गुणां दी मति) राहीं सिधे रसते ते पाउणा सी "ममा मन सिउ काजु है मन साधे सिधि होइ॥ पर असीं सरीर नूं तकलीफ़ देण नूं साधना मंन लिआ।
तजी ले बनारस मति भई थोरी ॥१॥ रहाउ॥ – कबीर जी ते कहि रहे ने तज़ी है बनारस ( कासी) मति बिबेक बुध दे अगे थौडी पै गई। सपसट कहि रहे ने कासी मत अधूरी मत है।
जिहड़े कहिंदे वाहिगुरू वाहिगुरू बार बार बोलणा जप है ते बार बार बोलण नाल ही परमेसर प्रापती कर लैणी उहनां लई दसम बाणी विच पातिस़ाह इह लिखदे हन।
भूमि अकास पताल रसातल जछ भुजंग सभै सिर निआवैं ॥ पाइ सकै नही पार प्रभा हू को नेत ही नेतह बेद बतावैं ॥ खोज थके सभ ही खुजीआ सुर हार परे हरि हाथ न आवै ॥७॥२४९॥ नारद से चतुरानन से रुमना रिख से सभ हूं मिलि गाइओ ॥ बेद कतेब न भेद लखिओ सभ हार परे हरि हाथि न आइओ ॥ पाइ सकै नही पार उमापति सिध सनाथ सनंतन धिआइओ ॥ धिआन धरो तिह को मन मैं जिह को अमितोजि सभै जगु छाइओ॥
भाव के सरबविआपी परमेसर दे हुकम दा, गुणां दे गिआन दा धिआन रखो नहीं तां सारे ही खुजीआ खोज खोज थक गए ते जिसदा अंत नहीं पाइआ जा सकदा उसनूं पा नहीं सके। जो बिअंत है उसदे गुणां नाम, उसदे गिआन नाल ही केवल उसदा पता लग सकदा है। होर आखदे हन के
तीरथ कोट कीए इसनान दीए बहु दान महा ब्रत धारे ॥ देस फिरिओ कर भेस तपो धन के सधरे न मिले हरि पिआरे ॥ आसन कोट करे असटांग धरे बहु निआस करे मुख कारे ॥ दीन दइआल अकाल भजे बिनु अंत को अंत के धाम सिधारे॥
आदि बाणी विच वी आखिआ गिआ है के "नादी बेदी सबदी मोनी जम के पटै लिखाइआ ॥२॥ – सबदी उह ने जेड़े इक स़बद नूं बार बार रटदे ने। आखदे नादी होवे, बेदी भाव बेद पड़्हन वाला होवे, जो केवल पड़्ह रहिआ है वीचार नहीं करदा, मौन धारण करन दा तप साध रहिआ है सबने जमां दे पटे ही लिखवाए हन। दसम बाणी विच आखदे हन
भूमि अकास पताल रसातल जछ भुजंग सभै सिर निआवैं ॥ पाइ सकै नही पार प्रभा हू को नेत ही नेतह बेद बतावैं ॥ खोज थके सभ ही खुजीआ सुर हार परे हरि हाथ न आवै ॥७॥२४९॥ नारद से चतुरानन से रुमना रिख से सभ हूं मिलि गाइओ ॥ बेद कतेब न भेद लखिओ सभ हार परे हरि हाथि न आइओ ॥ पाइ सकै नही पार उमापति सिध सनाथ सनंतन धिआइओ ॥ धिआन धरो तिह को मन मैं जिह को अमितोजि सभै जगु छाइओ॥
होर वी लिखिआ है के सरीरक कसट दे के, चतुराई करन नाल चतुरभुज, जिसदीआं बाहां चारो दिस़ावां विच फैलीआं हन उसनूं प्रापत नहीं कर सकदे।
किआ जपु किआ तपु किआ ब्रत पूजा॥ जा कै रिदै भाउ है दूजा॥ रे जन मनु माधउ सिउ लाईऐ॥ चतुराई न चतुरभुजु पाईऐ ॥
जिह बेद पुरान कतेब जपै॥ सुतसिंध अधो मुख ताप तपै॥ कई कलपन लौ तप ताप करै॥ नही नैक क्रिपा निधि पान परै॥
जपु तपु करि करि संजम थाकी हठि निग्रहि नही पाईऐ ॥
कोई पड़्हत कुरान को कोई पड़्हत पुरान॥ काल न सकत बचाइ कै फोकट धरम निदान॥(म १०। बचित्र नाटक, ५८)
कसट कीए जो न आवत है करि सीस जटा धरे हाथि न आवै॥ बिदिआ पड़े न कड़े तप सो अरु जो द्रिग मूंद कोऊ गुन गावै॥ बीन बजाइ सु न्रित दिखाइ बताइ भले हरि लोक रिझावै॥ प्रेम बिना कर मो नही आवत ब्रहम हू सो जिह भेद न पावै॥(प १०, चउबीस अवतार, ५४६)
तीरथु तपु दइआ दतु दानु॥ जे को पावै तिल का मानु॥ – नानक पातिस़ाह आखदे हन के तीरथ तप दइआ दान उह है जो परमेसर दे गिआन, नाम नूं तिल बराबर वी पा लवे। नीचे इस गल दा होर विसथार है। आखदे उसदी भगती तां कई कर रहे हन, पर भगत उही है जो उसनूं भाउंदा है। ते उसनूं भाउंदा उही है जो उसदी रजा उसदे हुकम नूं मंने।
तेरी भगति तेरी भगति भंडार जी भरे बिअंत बेअंता॥ तेरे भगत तेरे भगत सलाहनि तुधु जी हरि अनिक अनेक अनंता॥ तेरी अनिक तेरी अनिक करहि हरि पूजा जी तपु तापहि जपहि बेअंता॥ तेरे अनेक तेरे अनेक पड़हि बहु सिम्रिति सासत जी करि किरिआ खटु करम करंता॥ से भगत से भगत भले जन नानक जी जो भावहि मेरे हरि भगवंता॥
जपु तपु संजमु होहि जब राखे कमलु बिगसै मधु आस्रमाई ॥
"जतु पाहारा धीरजु सुनिआरु॥ अहरणि मति वेदु हथीआरु॥ भउ खला अगनि तप ताउ॥ भांडा भाउ अंम्रितु तितु ढालि॥ घड़ीऐ सबदु सची टकसाल॥ जिन कउ नदरि करमु तिन कार॥ नानक नदरी नदरि निहाल॥३८॥
गुरमुखि जप तप संजमी हरि कै नामि पिआरु ॥ – गुरमुख भाव गुणा नूं मुख रखण वाला उही है जो नाम (गुणां तों प्रापत सोझी) नूं हमेस़ा मुख रखण नूं ही जप, तप ते संजम मंने। संजम रखण दा भाव इह नहीं के बिहंगम रहे। जप तप संजम मन विच ही हुंदा है नाम (सोझी) ते टिको रहिण नाल "सचै सबदि सालाहणा सुखे सुखि निवासु॥ जपु तपु संजमु मनै माहि बिनु नावै ध्रिगु जीवासु॥ गुरमती नाउ पाईऐ मनमुख मोहि विणासु॥, हुकम भाणा ही जप तप ते संजम है।
"जपु तपु संजमु भाणा सतिगुरू का करमी पलै पाइ ॥
आखदे किहड़ा है जो इहो जिहा तप करे के नाम (गिआन तों प्रापत सोझी नाल हउमैं दी मल धो के मन नूं निरमल करे "कवन तपु जितु तपीआ होइ॥ कवनु सु नामु हउमै मलु खोइ॥३॥ गुण पूजा गिआन धिआन नानक सगल घाल॥ जिसु करि किरपा सतिगुरु मिलै दइआल॥
"पूरा मारगु पूरा इसनानु॥ सभु किछु पूरा हिरदै नामु॥१॥ पूरी रही जा पूरै राखी॥ पारब्रहम की सरणि जन ताकी॥१॥ रहाउ॥ पूरा सुखु पूरा संतोखु॥ पूरा तपु पूरन राजु जोगु॥२॥ पूरा मारग, इसनान ही हिरदे विच नाम नूं कहिआ है। इही सरण है, इही संतोख है, रिही पूरन तप है ते नाम प्रापती ही राज जोग है। इसदे होर वी उदाहरण हन जिवें
सतिगुरि मंत्रु दीओ हरि नाम॥ इह आसर पूरन भए काम॥२॥ जप तप संजम पूरी वडिआई॥ गुर किरपाल हरि भए सहाई॥३॥
प्रभ कै सिमरनि रिधि सिधि नउ निधि॥ प्रभ कै सिमरनि गिआनु धिआनु ततु बुधि॥ प्रभ कै सिमरनि जप तप पूजा॥
कई वीर भैणा सिमरन दे अरथ वी इक स़बद नूं बार बार बोलणा मंनदे हन। असीं निचले लेख विच इस बारे विचार कीती है।
जपणा ते सिमरन करना ? नाम जापण दी गुरमति विधी की है ?
बिदिआ तपु जोगु प्रभ धिआनु॥ – विदिआ, अकल सोझी, गिआन नूं सिधा ही तप ते जोग कहिआ है। रोज इह पड़दे हां के "सभि सत सभि तप सभि चंगिआईआ॥ सिधा पुरखा कीआ वडिआईआं॥ तुधु विणु सिधी किनै न पाईआ॥ करमि मिलै नाही ठाकि रहाईआ॥ – इसनूं समझण तों बिनां ते कई उपरंत वी भुलेखा खा जादेवहन ते किसे ना किसे तरीके दे पखंड विच जाणे अणजाणे फस जांदे हन। जिवें तीरथ, चलीए आदी। वेखो "स़रधा, करम, तीरथ ते परमेसर प्रापती, "की दसम ग्रंथ तीरथ इस़नान करन नूं कहिंदा है ?
जे किसे नूं फेर वी किसे नूं भुलेखा पवे तां सपस़ट वी लिखिआ है।
पुंन दान जप तप जेते सभ ऊपरि नामु॥ हरि हरि रसना जो जपै तिसु पूरन कामु॥
सभि जप सभि तप सभ चतुराई॥ ऊझड़ि भरमै राहि न पाई॥ बिनु बूझे को थाइ न पाई॥ नाम बिहूणै माथे छाई॥
गुरमुखि मनु असथाने सोई॥ गुरमुखि त्रिभवणि सोझी होई॥ इहु मनु जोगी भोगी तपु तापै॥ गुरमुखि चीनै॑ हरि प्रभु आपै॥
इकि तपसी बन महि तपु करहि नित तीरथ वासा॥ आपु न चीनहि तामसी काहे भए उदासा॥
गुर सेवा तपां सिरि तपु सारु ॥ – अते गुर सेवा दसी है स़बद वीचार।
ऐ जी जपु तपु संजमु सचु अधार॥ हरि हरि नामु देहि सुखु पाईऐ तेरी भगति भरे भंडार॥ – सच दा आधार जप तप ते संजम दसिआ है। सच है गुण, हुकम, नाम जो सदीव रहिण वाले हन। जग रचना नूं गुरमति झूठ दसदी है किउंके जग रचना बिनस जांदी है रेते दी कंध वांग है "जग रचना सभ झूठ है जानि लेहु रे मीत॥ कहि नानक थिरु ना रहै जिउ बालू की भीति॥
सो जपु सो तपु जि सतिगुर भावै ॥ – सति गुर भाव सचे दे गुण नूं हुकम नूं जो भावे उही जप तप है।
जप तप बरत कीने पेखन कउ चरणा राम॥ तपति न कतहि बुझै बिनु सुआमी सरणा राम॥ – राम (रमे होए) नूं वेखण लई संसारी जप तप कीते पर पातिस़ाह आखदे इस नाल मन दी तपत (विकारां दी अग) नहीं बुझदी। गुरमति वाला राम जो घट घट विच वसदा है उसदा पता ही नहीं है। निचले स़बद विच वी इही आख रहे हन
लाख भगत जा कउ आराधहि॥ लाख तपीसर तपु ही साधहि॥ लाख जोगीसर करते जोगा॥ लाख भोगीसर भोगहि भोगा॥२॥ घटि घटि वसहि जाणहि थोरा॥ है कोई साजणु परदा तोरा॥ करउ जतन जे होइ मिहरवाना॥ ता कउ देई जीउ कुरबाना॥
गुरमति वाला राम समझण लई वेखो "गुरमति विच राम
जपु तपु संजमु सभु गुर ते होवै हिरदै नामु वसाई ॥ – नाम (गुणां दी सोझी) नूं मन विछ वसाए बिनां कोई जप तप संजम कुझ नहीं हन। वेखो "नाम, जप अते नाम द्रिड़्ह किवें हुंदा?
होर वी बहुत सारीआं पंकतीआं बहुत सारे स़बद हन।
आपे सिंङी नादु है पिआरा धुनि आपि वजाए आपै॥ आपे जोगी पुरखु है पिआरा आपे ही तपु तापै॥ आपे सतिगुरु आपि है चेला उपदेसु करै प्रभु आपै॥
जप तप संजम गिआन तत बेता जिसु मनि वसै गोुपाला॥ नामु रतनु जिनि गुरमुखि पाइआ ता की पूरन घाला॥
बन खंड जाइ जोगु तपु कीनो कंद मूलु चुनि खाइआ॥ नादी बेदी सबदी मोनी जम के पटै लिखाइआ॥
भनति नानकु करे वीचारु॥ साची बाणी सिउ धरे पिआरु॥ ता को पावै मोख दुआरु॥ जपु तपु सभु इहु सबदु है सारु॥
सो जपु सो तपु सा ब्रत पूजा जितु हरि सिउ प्रीति लगाइ ॥
जोगी होवै जोगवै भोगी होवै खाइ॥ तपीआ होवै तपु करे तीरथि मलि मलि नाइ॥१॥
जप तप संजम करम न जाना नामु जपी प्रभ तेरा ॥
तिन ही कीआ जपु तपु धिआनु॥ अनिक प्रकार कीआ तिनि दानु॥ भगतु सोई कलि महि परवानु॥ जा कउ ठाकुरि दीआ मानु॥३॥ – जिसनूं ठाकुर नाम देवे, जिसनूं गुर प्रसाद मिले उसनूं ही इह गल पले पै दी है। इह समझ आउंदी है के करम राहीं परमेसर प्रापती नहीं हुंदी। नाम भाव गिआन, प्रेम ते हुकम मंनण नाल हुंदी है। कोई जोर नहीं चलदा मंगण जां देण ते "आखणि जोरु चुपै नह जोरु॥ जोरु न मंगणि देणि न जोरु॥ जोरु न जीवणि मरणि नह जोरु॥ जोरु न राजि मालि मनि सोरु॥ जोरु न सुरती गिआनि वीचारि॥ जोरु न जुगती छुटै संसारु॥ जिसु हथि जोरु करि वेखै सोइ॥ नानक उतमु नीचु न कोइ॥
जप तप संजम सुचि है सोई आपे करे कराई॥१३॥ – करते ने आप कराउणा।
मत भ्रमत प्रभ सरनी आइआ॥ दीना नाथ जगत पित माइआ॥ प्रभ दइआल दुख दरद बिदारण॥ जिसु भावै तिस ही निसतारण॥ अंध कूप ते काढनहारा॥ प्रेम भगति होवत निसतारा॥ साध रूप अपना तनु धारिआ॥ महा अगनि ते आपि उबारिआ॥ जप तप संजम इस ते किछु नाही॥ आदि अंति प्रभ अगम अगाही॥ नामु देहि मागै दासु तेरा॥ हरि जीवन पदु नानक प्रभु मेरा॥
अहिनिसि राम रहहु रंगि राते एहु जपु तपु संजमु सारा हे ॥ – गुरबाणी विच राम दे रंग, हरि दे रंग दी गल हुंदी है। इह लाल रंग गिआन दी लाली है। गिआन नाल सुका घट वी हरिआ होणा है। इह मजीठ रंग ने गूड़े रंग ने, हिरदे ते लग जाण फेर उतरदे नहीं।
गुरमति वाले जप तप दे बिअंत उदाहरण हन। नीचे कुझ होर उदाहरण हन समझण लई
जप तप संजम ना ब्रत पूजा॥ ना को आखि वखाणै दूजा॥ आपे आपि उपाइ विगसै आपे कीमति पाइदा॥६॥ ना सुचि संजमु तुलसी माला॥ गोपी कानु न गऊ गुोआला॥ तंतु मंतु पाखंडु न कोई ना को वंसु वजाइदा॥
जपु तपु संजमु नामु पिआरा॥ किलविख काटे काटणहारा॥ हरि कै नामि तनु मनु सीतलु होआ सहजे सहजि समाइदा॥
सो तपु पूरा साई सेवा जो हरि मेरे मनि भाणी हे ॥
अंतरि जपु तपु संजमो गुरसबदी जापै॥ हरि हरि नामु धिआईऐ हउमै अगिआनु गवापै॥ अंदरु अंम्रिति भरपूरु है चाखिआ सादु जापै॥ जिन चाखिआ से निरभउ भए से हरि रसि ध्रापै॥ हरि किरपा धारि पीआइआ फिरि कालु न विआपै॥
होम जग जप तप सभि संजम तटि तीरथि नही पाइआ॥ मिटिआ आपु पए सरणाई गुरमुखि नानक जगतु तराइआ॥
कोटि गिआनी कथहि गिआनु॥ कोटि धिआनी धरत धिआनु॥ कोटि तपीसर तप ही करते॥ कोटि मुनीसर मुोनि महि रहते॥७॥ अविगत नाथु अगोचर सुआमी॥ पूरि रहिआ घट अंतरजामी॥ जत कत देखउ तेरा वासा॥ नानक कउ गुरि कीओ प्रगासा॥
पंडित जन माते पड़ि॑ पुरान॥ जोगी माते जोग धिआन॥ संनिआसी माते अहंमेव॥ तपसी माते तप कै भेव॥१॥ सभ मद माते कोऊ न जाग॥ संग ही चोर घरु मुसन लाग॥
सभे सुरती जोग सभि सभे बेद पुराण॥ सभे करणे तप सभि सभे गीत गिआन॥ सभे बुधी सुधि सभि सभि तीरथ सभि थान॥ सभि पातिसाहीआ अमर सभि सभि खुसीआ सभि खान॥ सभे माणस देव सभि सभे जोग धिआन॥ सभे पुरीआ खंड सभि सभे जीअ जहान॥ हुकमि चलाए आपणै करमी वहै कलाम॥ नानक सचा सचि नाइ सचु सभा दीबानु॥
गुरमुखि हिरदै सांति है नाउ उगवि आइआ॥ जप तप तीरथ संजम करे मेरे प्रभ भाइआ॥ हिरदा सुधु हरि सेवदे सोहहि गुण गाइआ॥ मेरे हरि जीउ एवै भावदा गुरमुखि तराइआ॥ नानक गुरमुखि मेलिअनु हरि दरि सोहाइआ॥
सो जपु तपु सेवा चाकरी जो खसमै भावै ॥
से उधरे जिन राम धिआए॥ जतन माइआ के कामि न आए॥ राम धिआए सभि फल पाए धनि धंनि ते बडभागीआ॥ सतसंगि जागे नामि लागे एक सिउ लिव लागीआ॥ तजि मान मोह बिकार साधू लगि तरउ तिन कै पाए॥ बिनवंति नानक सरणि सुआमी बडभागि दरसनु पाए॥१॥ मिलि साधू नित भजह नाराइण॥ रसकि रसकि सुआमी गुण गाइण॥ गुण गाइ जीवह हरि अमिउ पीवह जनम मरणा भागए॥ सतसंगि पाईऐ हरि धिआईऐ बहुड़ि दूखु न लागए॥ करि दइआ दाते पुरख बिधाते संत सेव कमाइण॥ बिनवंति नानक जन धूरि बांछहि हरि दरसि सहजि समाइण॥२॥ सगले जंत भजहु गोपालै॥ जप तप संजम पूरन घालै॥ नित भजहु सुआमी अंतरजामी सफल जनमु सबाइआ॥ गोबिदु गाईऐ नित धिआईऐ परवाणु सोई आइआ॥ जप ताप संजम हरि हरि निरंजन गोबिंद धनु संगि चालै॥ बिनवंति नानक करि दइआ दीजै हरि रतनु बाधउ पालै॥३॥ मंगलचार चोज आनंदा॥ करि किरपा मिले परमानंदा॥ प्रभ मिले सुआमी सुखहगामी इछ मन की पुंनीआ॥ बजी बधाई सहजे समाई बहुड़ि दूखि न रुंनीआ॥ ले कंठि लाए सुख दिखाए बिकार बिनसे मंदा॥ बिनवंति नानक मिले सुआमी पुरख परमानंदा॥
हम कमल पुतु मीन बिआसा तपु तापन पूज करावैगो॥ जो जो भगतु होइ सो पूजहु भरमन भरमु चुकावैगो॥
सगले करम धरम सुचि संजम जप तप तीरथ सबदि वसे ॥
सेवा सुरत सब गिआन विचार है। इही जप है तप है ते हउमै नूं मारदा है। जीवन विछ जिउंदा ही मुकत करदा है।
सेवा सुरति सबदि वीचारि॥ जपु तपु संजमु हउमै मारि॥ जीवन मुकतु जा सबदु सुणाए॥ सची रहत सचा सुखु पाए॥
जपु तपु संजमु हउमै मारि ॥
जपु तपु संजमु नामु सम॑ालिआ ॥ – जे नाम हिरदे विछ समा गिआ, समालिआ गिआ इही जप (पछाण) ते इही तप (मन नूं तपाउणा) है।
होम जग उरध तप पूजा॥ कोटि तीरथ इसनानु करीजा॥ चरन कमल निमख रिदै धारे॥ गोबिंद जपत सभि कारज सारे॥६॥ ऊचे ते ऊचा प्रभ थानु॥ हरि जन लावहि सहजि धिआनु॥ दास दासन की बांछउ धूरि॥ सरब कला प्रीतम भरपूरि॥
सो भाई मन विच गिआन दुआरा हुकम दी सोझी लैणी है। मन नूं गिआन दी अग विछ तपा के ढालणा है के इस विछ विकार ना उठण जां हावी होण। सहिज पैदा होण ते सहिज दा धिआन रख के जो अडोल अवसथा बणदी है उह ही भगती मारग है। इस लई किसे जंगल हिमालिआ जां किसे भोरे विच जा के लुकण दी लोड़ नहीं पैंदी। हुकम नूं जप (पछाण) के वीचार के आपणे किरदार विच सहिज धारण कर "नानक सतिगुरि भेटिऐ पूरी होवै जुगति॥ हसंदिआ खेलंदिआ पैनंदिआ खावंदिआ विचे होवै मुकति॥, विकारा तों मुकती हो जाणी। सो धिआन रहे आदि बाणी अते दसम बाणी दोवें गिआन दी गल करदे हन। जिथे वी तप दी गल होई है उथे मन नूं गिआन नाल तपाउण दी गल होई है।

Source: ਸਾਧਨਾ ਅਤੇ ਤਪ (Sadhna and Tap)